हाल ही में भारतीय शोधकर्ताओं ने थायराइड कैंसर के आक्रामक, बार-बार होने वाले और उपचार-प्रतिरोधी स्वरूप के कारणों का पता लगाया है, जिसके परिणामस्वरूप प्रिसीजन थेरेपी (परिशुद्ध चिकित्सा) के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है। टाटा मेमोरियल सेंटर और दिल्ली विश्वविद्यालय, साउथ कैंपस के शोधकर्ताओं ने थायराइड कैंसर के भारतीय मरीजों में इसके व्यवहार को समझने के लिए एक अध्ययन किया। यह अध्ययन ‘JCO ग्लोबल ऑन्कोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है और इसे वैशाखी त्रिवेदी ने डॉ. कुमार प्रभाश और डॉ. अमित दत्त के मार्गदर्शन में किया।
प्रमुख निष्कर्ष:
- पैपिलरी थायराइड कैंसर (PTC): यह थायराइड कैंसर का सबसे आम प्रकार है, जो भारत में 80-85% मामलों के लिए जिम्मेदार है। यह आमतौर पर उपचार योग्य होता है, लेकिन कुछ मामलों में यह आक्रामक हो सकता है।
- DUOX2 जीन म्यूटेशन: शोध में 100 भारतीय मरीजों के डीएनए का विश्लेषण किया गया, जिसमें लगभग 9% मामलों में DUOX2 जीन में म्यूटेशन पाया गया। यह जीन, जो पहले थायराइड हार्मोन उत्पादन में अपनी भूमिका के लिए जाना जाता था, अब कैंसर की पुनरावृत्ति और खराब रोगनिदान (प्रोग्नोसिस) के लिए एक जोखिम कारक के रूप में सामने आया है। यह पहली बार है जब DUOX2 को PTC में एक प्राथमिक कारक के रूप में पहचाना गया है।
- दो नए उप-प्रकार:BRAF-RAS-प्रेरित उप-प्रकार: यह 62% मामलों में पाया गया और यह अधिक आक्रामक ट्यूमर व्यवहार से जुड़ा है। iBR (BRAF-RAS से स्वतंत्र) उप-प्रकार: यह एक नया खोजा गया समूह है, जिसमें पारंपरिक म्यूटेशन नहीं होते, लेकिन यह उपचार-प्रतिरोध और उच्च पुनरावृत्ति दर के साथ खतरनाक होता है। इसमें SMAD4 और TG जैसे जीनों में परिवर्तन देखे गए।
- एनाप्लास्टिक थायराइड कैंसर (ATC): यह थायराइड कैंसर का एक दुर्लभ और घातक रूप है। शोध में 68 नमूनों का विश्लेषण किया गया और 11% भारतीय मरीजों में THRA जीन में म्यूटेशन पाया गया, जो कोकेशियान मरीजों से अलग है।
प्रिसीजन थेरेपी के लिए इसका क्या अर्थ है?
- जेनेटिक प्रोफाइलिंग: शोध से पता चलता है कि DUOX2 म्यूटेशन वाले मरीजों की निगरानी सक्रिय रूप से की जा सकती है, जैसे कि ब्रेस्ट कैंसर में BRCA टेस्टिंग। इससे आक्रामक PTC का जल्दी निदान और पुनरावृत्ति को रोका जा सकता है।
- THRA जीन टारगेटिंग: ATC मरीजों के लिए THRA जीन की कार्यक्षमता को बहाल करने वाली थेरेपीज से उपचार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।
- वैयक्तिकृत उपचार: यह अध्ययन एक सामान्य उपचार दृष्टिकोण के बजाय मरीज की जेनेटिक प्रोफाइल के आधार पर अनुकूलित उपचार की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- उन्नत तकनीकें: CRISPR जीन एडिटिंग और स्मॉल-मॉलिक्यूल इनहिबिटर्स जैसे उन्नत उपकरणों का उपयोग करके इन खोजों को प्रयोगशाला से मरीजों तक ले जाया जा सकता है।
- निगरानी और निदान: शोधकर्ताओं का सुझाव है कि जेनेटिक प्रोफाइलिंग को बायोप्सी की तरह नियमित जांच का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।