भारत में निजी स्कूलों में लड़कों की संख्या लड़कियों से अधिक बनी हुई है। हाल के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में निजी स्कूलों की हिस्सेदारी और उनमें नामांकित लड़कों और लड़कियों की संख्या दोनों में वृद्धि हुई है। हालांकि, निजी स्कूलों में लड़कियों की हिस्सेदारी लड़कों की तुलना में काफी कम है।
विवरण:
- 2023-24 के आंकड़े: इस अवधि में, 54% लड़कियां सरकारी स्कूलों में पढ़ रही थीं, जबकि 33% निजी स्कूलों में थीं। वहीं, 49% लड़के सरकारी स्कूलों में और 39% निजी स्कूलों में पढ़ रहे थे।
- क्षेत्रीय अंतर: उत्तरी और पश्चिमी राज्यों में लड़कियों का नामांकन भारत के औसत (48.1%) से कम है। तमिलनाडु जैसे कुछ राज्यों में माध्यमिक स्कूलों में ड्रॉपआउट दर 7% है, जो राष्ट्रीय औसत से कम है।
- निजी स्कूलों की बढ़ती हिस्सेदारी: 2012-13 से 2023-24 तक, सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी 74.2% से घटकर 69.1% हो गई, जबकि निजी स्कूलों की हिस्सेदारी 17.2% से बढ़कर 22.5% हो गई। छात्रों के नामांकन में भी निजी स्कूलों का हिस्सा 28.2% से बढ़कर 36.3% हो गया।
- लैंगिक असमानता: निजी स्कूलों में लड़कों का नामांकन लड़कियों की तुलना में अधिक है, जो सामाजिक मान्यताओं को दर्शाता है, जहां लड़कों को परिवार की आय में योगदान देने वाले के रूप में प्राथमिकता दी जाती है।
- शैक्षिक प्रदर्शन: इसके बावजूद, लड़कियां शैक्षिक प्रदर्शन में लड़कों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हैं। कक्षा 12 में, निजी स्कूलों में 87.5% लड़कियां उत्तीर्ण हुईं, जबकि 75.6% लड़के उत्तीर्ण हुए।
कारण:
- सांस्कृतिक और सामाजिक मान्यताएं: कई परिवार लड़कों की शिक्षा को प्राथमिकता देते हैं, जिसके कारण लड़कियों को सरकारी स्कूलों में भेजा जाता है।
- आर्थिक बाधाएं: निजी स्कूलों की ऊंची फीस के कारण कई परिवार लड़कियों को इन स्कूलों में दाखिला नहीं दिलाते।
- बाल विवाह और घरेलू जिम्मेदारियां: ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों को कम उम्र में विवाह और घरेलू कामों में उलझा दिया जाता है, जिससे उनकी शिक्षा बाधित होती है।