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7/11 मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले ने 2006 में सात बम धमाकों के साथ देश को हिलाकर रख दिया था, जिसमें 209 लोग मारे गए और 700 से अधिक घायल हुए। महाराष्ट्र एटीएस ने दावा किया था कि यह हमला लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) और स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के पूर्व सदस्यों द्वारा किया गया, जिसमें पाकिस्तानी नागरिकों की भूमिका थी। हालांकि, 2025 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने सभी 12 अभियुक्तों को बरी कर दिया, जिससे यह मामला पूरी तरह से ढह गया। आइए, इस मामले के टूटने के कारणों को हिंदी में विस्तार से समझते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
11 जुलाई 2006 को मुंबई की उपनगरीय ट्रेनों में सात बम धमाके हुए, जो प्रेशर कुकर में रखे गए थे। ये धमाके चर्चगेट से पश्चिमी उपनगरों की ओर जाने वाली ट्रेनों के प्रथम श्रेणी डिब्बों में हुए। महाराष्ट्र एटीएस ने दावा किया कि 12 पाकिस्तानी बम निर्माताओं ने अवैध रूप से भारत में प्रवेश किया और मोहम्मद फैसल शेख के चेंबूर स्थित घर में बम बनाए। इनमें से छह बांग्लादेश सीमा, चार राजस्थान सीमा और दो नेपाल सीमा से आए थे।
प्रमुख आरोप और जांच
- पाकिस्तानी संलिप्तता का दावा:
- एटीएस ने कहा कि लश्कर-ए-तैयबा के कमांडर अजम चीमा ने अभियुक्तों को हथियार और विस्फोटक प्रशिक्षण दिया और आरडीएक्स प्रदान किया।
- 10 पाकिस्तानी नागरिकों और दो पाकिस्तान में रहने वाले भारतीयों ने मई 2006 में मुंबई में प्रवेश किया और बम बनाने की प्रक्रिया शुरू की।
- एक पाकिस्तानी, सलीम, धमाके में मारा गया, जबकि एक अन्य, अबू उसामा उर्फ अबू उमेद, को 22 अगस्त 2006 को मुंबई एटीएस के साथ मुठभेड़ में मार गिराया गया।
- अभियुक्तों की गिरफ्तारी:
- चार महीने के भीतर, एटीएस ने 13 भारतीयों को गिरफ्तार किया, जिनमें से 12 को 2015 में दोषी ठहराया गया। पांच को मृत्युदंड और सात को आजीवन कारावास की सजा दी गई।
- अभियुक्तों में फैसल शेख, एहतेशाम सिद्दीकी, नवेद हुसैन खान, और कमाल अंसारी जैसे लोग शामिल थे, जिन पर बम बनाने, रेकी करने और पाकिस्तानी आतंकवादियों को शरण देने का आरोप था।
- चार्जशीट और सबूत:
- नवंबर 2006 में, एटीएस ने 30 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की, जिसमें 13 पाकिस्तानी शामिल थे।
- अभियोजन पक्ष ने कॉल डिटेल रिकॉर्ड (सीडीआर), अभियुक्तों के इकबालिया बयान, और गवाहों के बयानों पर भरोसा किया। हालांकि, बाद में सीडीआर को सबूत के रूप में इस्तेमाल नहीं किया गया, और पुलिस ने दावा किया कि इन्हें नष्ट कर दिया गया।
मामला क्यों ढह गया?
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 21 जुलाई 2025 को सभी 12 अभियुक्तों को बरी कर दिया, जिसमें कई खामियां सामने आईं:
- इकबालिया बयानों की अविश्वसनीयता:
- हाईकोर्ट ने पाया कि 11 अभियुक्तों के इकबालिया बयान जबरन लिए गए थे और इनमें यातना (टॉर्चर) के सबूत थे।
- बयानों में एकरूपता नहीं थी, और इन्हें “कट-कॉपी-पेस्ट” जैसा बताया गया। कोर्ट ने इन्हें सबूत के रूप में स्वीकार करने से इनकार किया।
- पाकिस्तानी संलिप्तता का कोई ठोस सबूत नहीं:
- पाकिस्तानी आतंकवादियों के शामिल होने का दावा अभियुक्तों के बयानों पर आधारित था, लेकिन उनके पूर्ववृत्त (antecedents) स्थापित नहीं किए गए।
- महाराष्ट्र सरकार द्वारा पाकिस्तानियों पर बनाया गया डोजियर कभी सार्वजनिक नहीं किया गया, न ही इसे आरटीआई के तहत अभियुक्तों को दिया गया।
- सीडीआर का नष्ट होना:
- अभियोजन पक्ष ने पहले सीडीआर का इस्तेमाल अभियुक्तों को लश्कर-ए-तैयबा से जोड़ने के लिए किया, लेकिन बाद में इन्हें सबूत के रूप में छोड़ दिया। जब अभियुक्तों ने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए सीडीआर मांगे, तो पुलिस ने कहा कि वे नष्ट हो चुके हैं।
- कोर्ट ने इसे जांच की अखंडता पर गंभीर सवाल उठाने वाला और निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन माना।
- साक्ष्य प्रबंधन में लापरवाही:
- आरडीएक्स, डेटोनेटर, और अन्य सामग्रियों की बरामदगी को कोर्ट ने स्वीकार नहीं किया, क्योंकि इन्हें जब्त करने के बाद ठीक से सील नहीं किया गया था।
- गवाहों के बयान भी अविश्वसनीय पाए गए, क्योंकि एक गवाह ने धमाकों के 100 दिन बाद बयान दिया, और पहचान परेड में चार साल बाद अभियुक्तों की पहचान की गई।
- इंडियन मुजाहिदीन का दावा:
- 2008 में, मुंबई क्राइम ब्रांच ने दावा किया कि इंडियन मुजाहिदीन (आईएम) ने धमाके किए, जबकि एटीएस ने पाकिस्तानी नागरिकों को जिम्मेदार ठहराया।
- 2009 में, आईएम के नेता सादिक शेख ने धमाकों की जिम्मेदारी स्वीकार की, लेकिन कोर्ट ने इसे सबूतों के अभाव में खारिज कर दिया।
हाईकोर्ट का फैसला
- बॉम्बे हाईकोर्ट ने विशेष एमसीओसीए कोर्ट के 2015 के फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें पांच अभियुक्तों को मृत्युदंड और सात को आजीवन कारावास की सजा दी गई थी।
- कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष “पूरी तरह से विश्वसनीय सबूत देने में नाकाम रहा” और जांच में गंभीर खामियां थीं।
- सभी 12 अभियुक्तों को बरी कर दिया गया, बशर्ते वे अन्य मामलों में हिरासत में न हों। एक अभियुक्त, कमाल अंसारी, की 2021 में मृत्यु हो चुकी थी।