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चीन ने तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो (भारत में ब्रह्मपुत्र के रूप में जानी जाने वाली) नदी पर दुनिया के सबसे बड़े बांध का निर्माण शुरू कर दिया है। यह 167.8 अरब डॉलर (लगभग 14 लाख करोड़ रुपये) की लागत वाला मेगा-हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट न केवल ऊर्जा उत्पादन के लिए है, बल्कि इसे एक सैन्य और सामरिक हथियार के रूप में भी देखा जा रहा है, जो भारत और बांग्लादेश के लिए गंभीर चिंता का विषय है। आइए, इस बांध के सैन्य महत्व और भारत के लिए इसके खतरों को हिंदी में विस्तार से समझते हैं।
बांध का विवरण और स्थान
- स्थान: यह बांध तिब्बत के मेदोग काउंटी में यारलुंग त्सांगपो नदी के “ग्रेट बेंड” पर बनाया जा रहा है, जहां नदी 2,000 मीटर की ऊंचाई से तीव्र मोड़ लेती है और अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी के रूप में प्रवेश करती है। यह स्थान भारत की सीमा से मात्र 30-50 किलोमीटर दूर है।
- क्षमता: यह बांध 60,000 मेगावाट बिजली पैदा करने में सक्षम होगा, जो चीन के थ्री गॉर्जेस बांध से तीन गुना अधिक है। यह प्रतिवर्ष 300 अरब किलोवाट-घंटा बिजली उत्पादन करेगा, जो ब्रिटेन की वार्षिक खपत के बराबर है।
- निर्माण: चीनी प्रधानमंत्री ली कियांग ने जुलाई 2025 में न्यिंगची शहर में इसकी आधारशिला रखी। यह परियोजना 2030 के दशक में पूरी होने की उम्मीद है और इसमें पांच कैस्केड हाइड्रोपावर स्टेशन शामिल होंगे।
सैन्य और सामरिक महत्व
चीन का यह बांध केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है; इसे एक सैन्य और सामरिक हथियार के रूप में देखा जा रहा है, जिसके कारण भारत में अलार्म की स्थिति है। इसके प्रमुख सैन्य और सामरिक पहलू निम्नलिखित हैं:
- जल प्रवाह पर नियंत्रण:
- ब्रह्मपुत्र नदी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों (अरुणाचल प्रदेश और असम) और बांग्लादेश की जीवनरेखा है। यह नदी कृषि, मत्स्य पालन और पेयजल के लिए महत्वपूर्ण है।
- बांध के जरिए चीन नदी के जल प्रवाह को नियंत्रित कर सकता है। वह पानी को रोककर सूखा पैदा कर सकता है या अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़कर भारत और बांग्लादेश में विनाशकारी बाढ़ ला सकता है। इसे “वाटर बम” (जल बम) के रूप में देखा जा रहा है।
- अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इसे “टिकिंग वाटर बम” और “सैन्य खतरे से भी बड़ा खतरा” बताया है। उन्होंने कहा कि अगर चीन अचानक पानी छोड़ता है, तो सियांग क्षेत्र और आदिवासी समुदाय (जैसे आदि जनजाति) पूरी तरह तबाह हो सकते हैं।
- भू-राजनीतिक दबाव:
- बांध का स्थान अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास है, जिसे चीन “दक्षिण तिब्बत” कहकर अपना दावा करता है। यह क्षेत्र भारत-चीन सीमा विवाद का केंद्र है।
- चीन का यह कदम भारत पर भू-राजनीतिक दबाव बढ़ाने का एक तरीका है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बांध जल संसाधनों को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने (वाटर वेपनाइजेशन) की रणनीति का हिस्सा है, जैसा कि चीन ने मेकांग नदी पर दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ किया।
- 2017 में डोकलाम विवाद के दौरान चीन ने ब्रह्मपुत्र के हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करना बंद कर दिया था, जिसके बाद असम में बाढ़ ने 70 से अधिक लोगों की जान ले ली थी। यह दर्शाता है कि चीन जल प्रवाह को रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।
- रणनीतिक लाभ:
- बांध की स्थिति तिब्बत के भूकंप-प्रवण क्षेत्र में है, जो इसे जोखिम भरा बनाता है। अगर यह बांध भूकंप, इंजीनियरिंग दोष या तोड़फोड़ के कारण ढह जाता है, तो अरुणाचल और असम में तबाही मच सकती है।
- विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की यह परियोजना न केवल ऊर्जा उत्पादन के लिए है, बल्कि यह भारत और बांग्लादेश पर सामरिक दबाव बनाने और क्षेत्रीय प्रभुत्व स्थापित करने का एक उपकरण है।
भारत के लिए चिंताएं
- पानी की उपलब्धता और बाढ़ का खतरा:
- ब्रह्मपुत्र भारत के 30% ताजे पानी के संसाधनों का स्रोत है। अगर चीन पानी रोकता है, तो असम और अरुणाचल में कृषि (चावल, चाय, जूट), मत्स्य पालन और पेयजल की आपूर्ति प्रभावित होगी।
- अचानक पानी छोड़ने से अरुणाचल और असम में विनाशकारी बाढ़ आ सकती है, जिससे संपत्ति, जमीन और मानव जीवन को भारी नुकसान होगा।
- पारिस्थितिकीय और सामाजिक प्रभाव:
- बांध के कारण नदी के तलछट (सेडिमेंट) प्रवाह में कमी आ सकती है, जो नदी के किनारों के कटाव को बढ़ाएगा और मिट्टी की उर्वरता को कम करेगा। यह असम और बांग्लादेश में कृषि को प्रभावित करेगा।
- बांग्लादेश में, जहां ब्रह्मपुत्र 65% पानी की आपूर्ति करता है, जल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन लाखों लोगों के लिए खतरा बन सकता है।
- पारदर्शिता की कमी:
- चीन ने इस परियोजना के बारे में कोई पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) या तकनीकी विवरण साझा नहीं किया है, जिससे भारत और बांग्लादेश में चिंताएं बढ़ी हैं।
- 2006 में स्थापित भारत-चीन विशेषज्ञ-स्तरीय तंत्र (ELM) के तहत बाढ़ के मौसम में हाइड्रोलॉजिकल डेटा साझा करने का समझौता है, लेकिन चीन की गोपनीयता और डेटा साझा करने में अनियमितता ने भारत का विश्वास कम किया है।
भारत की प्रतिक्रिया
- सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट:
- भारत ने अरुणाचल प्रदेश में सियांग नदी पर एक काउंटर बांध, सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट, बनाने की योजना बनाई है। यह जल सुरक्षा सुनिश्चित करने और चीन के संभावित जल हथियार को निष्प्रभावी करने के लिए एक “रक्षा तंत्र” के रूप में काम करेगा।
- हालांकि, इस परियोजना को स्थानीय विरोध का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर विस्थापन और पर्यावरणीय नुकसान का डर है।
- कूटनीतिक प्रयास:
- भारत ने चीन से बार-बार पारदर्शिता और डाउनस्ट्रीम देशों के हितों की रक्षा की मांग की है। विदेश मंत्रालय ने जनवरी 2025 में कहा कि भारत इस परियोजना की निगरानी करेगा और अपने हितों की रक्षा के लिए उपाय करेगा।
- दिसंबर 2024 में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच सीमा वार्ता में ट्रांस-बॉर्डर नदियों पर डेटा साझा करने पर चर्चा हुई।
- विशेषज्ञों की राय:
- कुछ विशेषज्ञ, जैसे नीलांजन घोष (ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन), का कहना है कि यह बांध रन-ऑफ-द-रिवर प्रोजेक्ट हो सकता है, जो जल प्रवाह को लंबे समय तक प्रभावित नहीं करता। हालांकि, मानसून के दौरान डेटा साझा करने की कमी भारत के लिए मुख्य चिंता है।
- असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सर्मा ने आशावादी रुख अपनाते हुए कहा कि ब्रह्मपुत्र का अधिकांश जल भारत में भारी बारिश और सहायक नदियों (जैसे लोहित, दिबांग) से आता है, इसलिए चीन का प्रभाव सीमित हो सकता है।
चीन का दृष्टिकोण
- चीन का दावा है कि यह बांध स्वच्छ ऊर्जा और तिब्बत के विकास के लिए है, और इसका डाउनस्ट्रीम देशों पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा।
- चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने कहा कि यह परियोजना डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों को प्रभावित नहीं करेगी और चीन डेटा साझा करने और आपदा रोकथाम में सहयोग बढ़ाएगा।
- हालांकि, चीन ने संयुक्त राष्ट्र की 2014 की गैर-नौवहन अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है, जिसके कारण जल साझा करने के लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।
भारत के लिए चुनौतियां
- सैन्य तनाव: भारत-चीन सीमा पर हाल के सैन्य तनाव (2020 लद्दाख टकराव) और डोकलाम जैसे विवादों ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को बढ़ाया है। बांध को एक रणनीतिक दबाव बिंदु के रूप में देखा जा रहा है।
- पारिस्थितिकीय जोखिम: तिब्बत का भूकंप-प्रवण क्षेत्र और भारी वर्षा बांध के लिए इंजीनियरिंग चुनौतियां पैदा करती है। अगर यह ढहता है, तो भारत और बांग्लादेश में तबाही मच सकती है।
- क्षेत्रीय अस्थिरता: बांध से बांग्लादेश में भी जल संकट और पारिस्थितिक असंतुलन का खतरा है, जिससे भारत-बांग्लादेश संबंधों पर असर पड़ सकता है।