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सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची के संशोधन (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है, जिसमें आधार कार्ड को 12वें दस्तावेज के रूप में स्वीकार करने का आदेश दिया गया है। यह फैसला न केवल बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए मतदाता सूची से संबंधित नियमों को प्रभावित कर सकता है।
चुनाव आयोग की जिद और कोर्ट का आदेश
जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस बागची की पीठ ने चुनाव आयोग की उस जिद को खारिज कर दिया, जिसमें वह आधार को मतदाता पंजीकरण के लिए मान्यता देने से इनकार कर रहा था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब 11 दस्तावेजों के साथ-साथ आधार को भी 12वें दस्तावेज के रूप में स्वीकार करना होगा। योगेंद्र यादव, जो इस मामले में याचिकाकर्ता हैं, ने इसे “एसआईआर के जहर को निकालने वाला” फैसला बताया।
क्या थी समस्या?
चुनाव आयोग द्वारा मांगे जा रहे 11 दस्तावेजों में से कई लोगों के पास कोई भी एक दस्तावेज उपलब्ध नहीं था। बिहार में लगभग 40% मतदाताओं, यानी डेढ़ से दो करोड़ लोगों के नाम, इस प्रक्रिया के कारण वोटर लिस्ट से हटने का खतरा था। याचिकाकर्ताओं ने इसे चुनाव आयोग का “षड्यंत्र” करार दिया, जिसका मकसद बड़े पैमाने पर मतदाताओं को वोटर लिस्ट से बाहर करना था।
कोर्ट में पेश सबूत
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट में पुख्ता सबूत पेश किए, जिसमें सीतामढ़ी जिले के एक चुनाव अधिकारी द्वारा आधार स्वीकार करने पर जारी शो-कॉज नोटिस, 24 लोगों के हलफनामे और मधेपुरा के दो बीएलओ के वीडियो बयान शामिल थे। इन सबूतों ने साबित किया कि चुनाव आयोग ने आधार को अस्वीकार करने के लिए स्पष्ट निर्देश दिए थे, जो कोर्ट ने “आदेश की अवमानना” माना।
आधार की प्रामाणिकता पर बहस
चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है। जवाब में जस्टिस बागची ने कहा कि स्वीकार किए जा रहे 11 दस्तावेजों में से 9 भी नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं। आधार पहचान, आयु, पता और माता-पिता का नाम सत्यापित करने के लिए पर्याप्त है, और इसकी जांच सरकार के डेटाबेस के जरिए आसानी से की जा सकती है।
फैसले का प्रभाव
इस आदेश के बाद, बिहार में जिन मतदाताओं को नोटिस मिले हैं या जो नया आवेदन करना चाहते हैं, वे केवल आधार देकर प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। योगेंद्र यादव ने कहा कि यह फैसला पूरे देश पर लागू होगा, क्योंकि यह रिप्रेजेंटेशन ऑफ पीपल्स एक्ट की व्याख्या पर आधारित है। यह फैसला लाखों गरीब, मजदूर और प्रवासी मतदाताओं के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।
कानूनी लड़ाई और अगले कदम
इस मामले में योगेंद्र यादव, एडीआर, महुआ मोहत्रा, मनोज झा जैसे याचिकाकर्ताओं के साथ वकील कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंहवी, वृंदा ग्रोवर, प्रशांत भूषण और अन्य ने बिना फीस लिए केस लड़ा। अब 30 सितंबर को वोटर लिस्ट की अंतिम सूची आने वाली है, और सभी की नजर इस बात पर होगी कि चुनाव आयोग इस फैसले को कैसे लागू करता है।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने न केवल बिहार के मतदाताओं को राहत दी है, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया है कि मतदाता सूची से लोगों को बाहर करने की कोई साजिश सफल न हो। योगेंद्र यादव ने सुप्रीम कोर्ट को संविधान की रक्षा के लिए सलाम किया और कहा कि यह फैसला लोकतंत्र को मजबूत करने में मील का पत्थर साबित होगा।