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नेपाल में हाल के दिनों में भड़का जन विद्रोह, जिसे “जेन-जी विद्रोह” के नाम से जाना जा रहा है, ने देश की राजनीति को हिलाकर रख दिया है। भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग, और आर्थिक असमानता के खिलाफ युवा पीढ़ी के गुस्से ने प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। इस विद्रोह ने संसद भवन में आगजनी, नेताओं के घरों पर हमले, और सोशल मीडिया पर प्रतिबंध जैसे कई गंभीर घटनाक्रमों को जन्म दिया, जिससे नेपाल में अराजकता का माहौल बन गया।
विद्रोह की शुरुआत और कारण
नेपाल में 8 सितंबर को पुलिस की गोलीबारी में 19 छात्रों की मौत ने जनता के गुस्से को भड़का दिया। इसके बाद प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन में घुसकर आग लगा दी और “केपी चोर देश छोड़” जैसे नारे लगाए। यह गुस्सा न केवल नेताओं, बल्कि उनके बेटों की आलीशान जीवनशैली के खिलाफ भी था, जो फिलीपींस और इंडोनेशिया जैसे देशों में हुए भ्रष्टाचार विरोधी प्रदर्शनों से प्रेरित बताया जा रहा है।
नेपाल की जनता लंबे समय से केवल तीन नेताओं—के.पी. शर्मा ओली, शेर बहादुर देउबा, और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’—के बीच सत्ता के घूमने से त्रस्त थी। ओली ने अपनी पार्टी सीपीएन यूएमएल के संविधान में संशोधन कर 70 साल की उम्र सीमा हटाई, ताकि वे तीसरी बार पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बने रह सकें। इसके अलावा, उन्होंने युवा नेताओं के लिए उम्र सीमा लागू कर दी, जिससे कई युवा नेता अयोग्य हो गए। इन कदमों ने जनता में असंतोष को और बढ़ा दिया।
भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी
नेपाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ जवाबदेही की कमी ने जनता का गुस्सा भड़काया। 2006 में बने एक कानून के तहत कैबिनेट के निर्णयों को ‘पॉलिसी डिसीजन’ मानकर भ्रष्टाचार की जांच से छूट दी गई। ओली ने संवैधानिक एंटी-ग्राफ्ट बॉडी में अपने वफादार नौकरशाह को नियुक्त किया, जिसने पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच को रोका।
- के.पी. शर्मा ओली पर चाय बागान को कमर्शियल प्लॉट में बदलने का आरोप है।
- शेर बहादुर देउबा पर विमान डील में कमीशन और उनकी पत्नी पर भूटानी शरणार्थियों को नागरिकता दिलाने के लिए घूस लेने का आरोप है।
- पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ पर माओवादी शांति समझौते की राशि के गबन का आरोप है।
सोशल मीडिया प्रतिबंध और हिंसा
ओली सरकार ने YouTube, Facebook, Instagram, और Twitter जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर प्रतिबंध लगा दिया, दावा करते हुए कि इनका उपयोग हेट स्पीच और अपराध फैलाने के लिए हो रहा था। इस प्रतिबंध ने युवाओं के गुस्से को और भड़काया, जिसके बाद हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। 9 सितंबर को हुई हिंसा में 19 युवाओं की जान चली गई, जिसके बाद सरकार को प्रतिबंध हटाना पड़ा और गृह मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा।
जेन-जी आंदोलन और हिंसा से दूरी
जेन-जी प्रदर्शनकारियों ने हिंसा से खुद को अलग करते हुए कहा कि उनका मकसद शांतिपूर्ण आंदोलन था। उन्होंने मांग की कि नेपाल का अगला नेता स्वतंत्र, ईमानदार, और योग्य हो। हालांकि, हिंसक तत्वों ने मौके का फायदा उठाया, जिसके परिणामस्वरूप संसद, सुप्रीम कोर्ट, और कांतपुर टाइम्स जैसे मीडिया हाउस की इमारतों में आग लगा दी गई। जेन-जी ने इस हिंसा पर अफसोस जताया और घोषणा की कि वे अब आंदोलन नहीं करेंगे।
नेताओं और उनके घरों पर हमले
प्रदर्शनकारियों ने ओली, उप प्रधानमंत्री, वित्त मंत्री, और पूर्व प्रधानमंत्रियों के घरों पर पत्थरबाजी और आगजनी की। त्रिभुवन अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर भीड़ जमा होने के बाद हवाई अड्डा बंद करना पड़ा। एक बड़े होटल, हिल्टन, में भी आग लगा दी गई, जिसके बारे में अफवाह थी कि उसमें एक पूर्व प्रधानमंत्री के बेटे की हिस्सेदारी थी।
आर्थिक असमानता और बेरोजगारी
विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, नेपाल की जीडीपी में वृद्धि के बावजूद, आर्थिक असमानता और बेरोजगारी बढ़ रही है। 82% लोग असंगठित क्षेत्र में कम वेतन पर काम करते हैं, और रोजगार सृजन नहीं हो रहा। कोविड के बाद मंदी, उच्च कर, और खराब सार्वजनिक सुविधाओं ने जनता की परेशानी को बढ़ाया।
अशांति के बाद की स्थिति
नेपाल में सेना ने कर्फ्यू लगा दिया है, और जेन-जी प्रतिनिधि राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल के साथ बातचीत की कोशिश कर रहे हैं। काठमांडू के मेयर बालेन शाह को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाने की चर्चा है, क्योंकि वे युवाओं और जेन-जी के बीच लोकप्रिय हैं।
भारत के लिए चिंता
बांग्लादेश के बाद नेपाल में यह अस्थिरता भारत के लिए चिंता का विषय बन गई है। कुछ लोग इसे बाहरी शक्तियों का खेल मान रहे हैं, लेकिन नेपाल के आंतरिक कारणों—भ्रष्टाचार, सत्ता का दुरुपयोग, और आर्थिक असमानता—को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।