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भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल के वर्षों में सोने की खरीद को लेकर अपनी रणनीति में उल्लेखनीय बदलाव किया है। वर्ष 2024 में RBI का सोना भंडार 822 टन से बढ़कर 879 टन से अधिक हो गया और वित्तीय वर्ष 2025 तक यह 880 टन के करीब पहुंच चुका है। विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी भी पिछले साल के 8.9% से बढ़कर 12.1% हो गई है। यह कदम न केवल भारत, बल्कि वैश्विक स्तर पर केंद्रीय बैंकों की उस प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें वे अपने भंडार में विविधता लाने के लिए सोने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। चीन, ब्राजील और तुर्की जैसे देश भी अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।
RBI की सोने की खरीद के पीछे कारण
- भू-राजनीतिक सुरक्षा की गारंटी 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस की 30 अरब डॉलर से अधिक की संपत्तियों को फ्रीज कर दिया। इस घटना ने साबित किया कि विदेशी मुद्राएं राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल हो सकती हैं। जवाब में, RBI ने सोने को प्राथमिकता दी, क्योंकि यह एक तटस्थ और प्रतिबंध-मुक्त संपत्ति है, जो किसी भी देश के नियंत्रण से मुक्त है। यह भारत को वैश्विक अनिश्चितताओं और प्रतिबंधों से सुरक्षा प्रदान करता है।
- विदेशी मुद्रा भंडार में विविधता RBI अमेरिकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को कम करने की दिशा में काम कर रहा है। सोना एक ऐसी संपत्ति है, जिसे हथियार के रूप में उपयोग करने की संभावना कम होती है। यह गैर-संप्रभु और गैर-देयता वाली संपत्ति के रूप में भंडार को संतुलित करने में मदद करता है।
- आर्थिक स्थिरता के लिए रणनीतिमुद्रास्फीति से सुरक्षा: मुद्रास्फीति के दौरान मुद्रा की क्रय शक्ति घटती है, लेकिन सोने का मूल्य स्थिर रहता है और बढ़ता है। यह RBI को मुद्रास्फीति के खिलाफ एक मजबूत बचाव प्रदान करता है। मुद्रा में स्थिरता: भारतीय रुपये के कमजोर होने पर सोने की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार का मूल्य स्थिर रहता है। संकटकालीन संपत्ति: आर्थिक उथल-पुथल के समय सोना एक विश्वसनीय संपत्ति के रूप में उभरता है।
डी-डॉलरकरण और वित्तीय स्वतंत्रता की ओर कदम
RBI की यह रणनीति डी-डॉलरकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिसका लक्ष्य वैश्विक वित्तीय प्रणाली में अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व को कम करना है। सोने की खरीद भारत की वित्तीय संप्रभुता को मजबूत करती है और अमेरिकी ट्रेजरी बांड पर निर्भरता को घटाती है। यह भारत की उस महत्वाकांक्षा को भी बल देता है, जिसमें वह एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में प्रमुख खिलाड़ी बनना चाहता है।
इस रणनीति के प्रभाव
- भंडार में वृद्धि: सोने की हिस्सेदारी बढ़ने से विदेशी मुद्रा भंडार का मूल्य और स्थिरता बढ़ रही है।
- सोने की कीमतों में उछाल: वैश्विक मांग के कारण सोने की कीमतें रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई हैं। RBI ने इस साल सोने के लिए 40% अधिक भुगतान किया है।
- डॉलर के प्रभुत्व में कमी: वैश्विक भंडार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी 2000 के 71% से घटकर 2024 में 58% हो गई है। वहीं, सोने की हिस्सेदारी 2015 से लगभग दोगुनी हो गई है।
- भारत के लिए रणनीतिक लाभ: सोने का बढ़ता भंडार भारत को आर्थिक संकटों में लचीलापन, निवेशकों का विश्वास, वैश्विक वित्त में विश्वसनीयता और एक मजबूत रणनीतिक स्थिति प्रदान करता है।
आगे की राह
RBI की सोने की खरीद भविष्य में और बढ़ने की संभावना है। यह युआन और यूरो जैसी मुद्राओं के उदय को बढ़ावा देगा और भारतीय रुपये के अंतरराष्ट्रीयकरण को प्रोत्साहित करेगा। भारत वैश्विक डी-डॉलरकरण की दिशा में सक्रिय भूमिका निभाता रहेगा, जिससे वह वैश्विक वित्तीय परिदृश्य में अपनी स्थिति को और मजबूत करेगा।