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भारत एक खामोश मानसिक स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है, जो न केवल समाज बल्कि अर्थव्यवस्था को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है। यह एक ऐसी समस्या है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
संकट की गंभीरता और आँकड़े
- भारत की 0.9% आबादी आत्महत्या के जोखिम में है, और इनमें से ज्यादातर लोग मदद मांगने से हिचकिचाते हैं।
- हर 20 में से 1 भारतीय अवसाद (डिप्रेशन) से जूझ रहा है।
- करीब 60 मिलियन लोग किसी न किसी मानसिक बीमारी से पीड़ित हैं, जिनमें से 50 मिलियन अवसाद या गंभीर चिंता से ग्रस्त हैं।
- केवल 10% मरीजों को ही किसी तरह की मदद मिल पाती है।
- उपचार का अंतर (treatment gap) 70% से अधिक है।
- 2021 में 1.64 लाख आत्महत्याएँ दर्ज की गईं, जो 2022 में बढ़कर 1.72 लाख हो गईं।
- आत्महत्या से होने वाली मौतों में भारत विश्व में पहले स्थान पर है।
- भारत अपने कुल स्वास्थ्य बजट का मात्र 1% ही मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जो एक चिंताजनक आँकड़ा है।
संकट के प्रमुख कारण
- सामाजिक कलंक: मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के बराबर नहीं माना जाता, और सांस्कृतिक शर्म के कारण लोग मदद मांगने से डरते हैं। परिवार भी अक्सर बीमारी को छिपाने की कोशिश करते हैं।
- मनोचिकित्सकों की कमी: विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) प्रति लाख आबादी पर तीन मनोचिकित्सकों की सिफारिश करता है, लेकिन भारत में 2019 में यह संख्या एक से भी कम थी। हालाँकि अब यह बढ़कर 27,000 हो गई है, फिर भी यह आबादी की जरूरतों के लिए नाकाफी है।
- शहरी-ग्रामीण अंतर: ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और सुविधाओं की भारी कमी है।
- डिजिटल प्रभाव: सोशल मीडिया पर FOMO (छूट जाने का डर), साइबरबुलिंग, तुलना का दबाव, और ऑनलाइन धोखाधड़ी जैसी गतिविधियाँ चिंता, अवसाद और आत्महत्या के मामलों को बढ़ा रही हैं।
संकट के परिणाम
- यह संकट युवाओं, महिलाओं और श्रमिकों को प्रभावित कर रहा है, जिससे भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश और आर्थिक विकास खतरे में है।
- मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण प्रति माह 15 कार्यदिवसों का नुकसान होता है, जिससे उत्पादकता, नवाचार और निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है।
- भारत को मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण 1 ट्रिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है।
- आत्महत्या से होने वाला नुकसान अकेले 1.4 लाख करोड़ रुपये है।
- 21% परिवार मानसिक स्वास्थ्य देखभाल पर अपनी मासिक आय का 20% खर्च करने के कारण गरीबी रेखा से नीचे चले गए हैं।
सरकारी प्रयास
- राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति 2022: इसका लक्ष्य 2030 तक आत्महत्या दर को हर साल 10% कम करना है।
- टेली-मानस (2022): यह 24×7 हेल्पलाइन 20 से अधिक भाषाओं में उपलब्ध है और अब तक 7 लाख से अधिक कॉल्स संभाल चुकी है।
- जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम: 692 जिलों में सक्रिय है।
- मनोदर्पण: छात्रों, शिक्षकों और परिवारों के लिए परामर्श सेवाएँ प्रदान करता है।
- राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम: किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर केंद्रित, जिसमें किशोर क्लीनिक और पीयर एजुकेटर शामिल हैं।
चुनौतियाँ
- राज्य स्तर पर योजनाओं का कार्यान्वयन असमान है।
- फंडिंग और प्रशिक्षित पेशेवरों की कमी एक बड़ी बाधा है।
आगे क्या करना चाहिए?
- सरकार को स्वास्थ्य बजट में मानसिक स्वास्थ्य के लिए अधिक आवंटन करना चाहिए।
- मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा।
- निजी क्षेत्र को कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य नीतियों को लागू करना चाहिए, जिसमें ईमानदार परामर्श पर जोर हो।
- प्रौद्योगिकी का उपयोग बढ़ाना चाहिए, जैसे टेली-मानस का विस्तार और AI-आधारित चैट समर्थन को आयुषमान भारत डिजिटल मिशन के साथ जोड़ना।
- आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं को बुनियादी परामर्श प्रशिक्षण देना चाहिए।
- जागरूकता अभियान चलाकर परिवारों को मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को छिपाने से रोकना होगा।
- स्कूलों, कॉलेजों और समुदायों में मानसिक स्वास्थ्य साक्षरता और खुली चर्चा को बढ़ावा देना चाहिए ताकि कलंक को खत्म किया जा सके।
निष्कर्ष मानसिक स्वास्थ्य संकट भारत के लिए एक गंभीर चुनौती है, जो समाज के हर वर्ग को प्रभावित कर रहा है। अब समय है कि इस मुद्दे पर खुलकर बात हो, कलंक को तोड़ा जाए और प्रभावी कदम उठाए जाएँ। यह संकट केवल व्यक्तियों का नहीं, बल्कि पूरे देश का है, और इसे हल करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी हैं।