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1 मई 1960 को बॉम्बे राज्य का विभाजन दो राज्यों – महाराष्ट्र और गुजरात – में हुआ, जिसकी पृष्ठभूमि में लंबी और जटिल सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक कहानी थी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1661 में पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन की शादी इंग्लैंड के किंग चार्ल्स द्वितीय से होने पर बॉम्बे के द्वीप दहेज के रूप में ब्रिटिश नियंत्रण में आए। प्रबंधन की चुनौतियों के कारण, 1668 में चार्ल्स द्वितीय ने इसे ईस्ट इंडिया कंपनी को पट्टे पर दे दिया। कंपनी ने बॉम्बे प्रेसीडेंसी की स्थापना की और इसे व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित किया। पारसी, वनिया और बोरा जैसे गुजराती व्यापारिक समुदायों को प्रोत्साहन मिला, जिन्होंने बॉम्बे को सूरत के बाद पश्चिमी भारत का प्रमुख व्यापारिक केंद्र बनाया।
1857 के सिपाही विद्रोह के बाद, ब्रिटिश क्राउन ने भारत का नियंत्रण अपने हाथों में लिया। बॉम्बे प्रेसीडेंसी में आधुनिक महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरी कर्नाटक, सिंध और यमन के हिस्से शामिल थे। हालांकि, 1935 में यमन और 1936 में सिंध को अलग कर दिया गया।
सांस्कृतिक और आर्थिक टकराव
ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रोत्साहन से बॉम्बे में गुजराती अभिजात वर्ग का प्रभुत्व बढ़ा, जिससे मराठी मजदूरों और गुजराती व्यापारियों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक तनाव पैदा हुआ। बॉम्बे शहर व्यापार का केंद्र था, लेकिन मराठी भाषी समुदाय इसे अपने सांस्कृतिक और प्रशासनिक केंद्र के रूप में देखते थे। इन टकरावों ने बॉम्बे राज्य के पुनर्गठन की मांग को तेज किया।
स्वतंत्रता के बाद विवाद
स्वतंत्रता के बाद, गुजराती अभिजात वर्ग बॉम्बे को अपने व्यापारिक केंद्र के रूप में बनाए रखना चाहता था, जबकि संयुक्त महाराष्ट्र परिषद ने बॉम्बे को राजधानी बनाकर एक मराठी भाषी राज्य की मांग की। जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल भाषाई आधार पर राज्यों के विभाजन के खिलाफ थे, क्योंकि उन्हें राष्ट्रीय एकता पर खतरा महसूस हुआ।
राज्य पुनर्गठन के प्रयास
- एस.के. धर आयोग (1948): इस आयोग ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन को अव्यवहारिक माना और बॉम्बे पर कोई ठोस समाधान नहीं दिया। संयुक्त महाराष्ट्र परिषद और बी.आर. अंबेडकर ने बॉम्बे को महाराष्ट्र का हिस्सा माना, जबकि गुजराती व्यापारियों ने इसे केंद्रीय प्रशासित क्षेत्र बनाने की मांग की।
- राज्य पुनर्गठन समिति (1953-1955): 1953 में पोटी श्री रामुलु की मृत्यु के बाद भाषाई पुनर्गठन की मांग तेज हुई, जिसके परिणामस्वरूप आंध्र प्रदेश का गठन हुआ। समिति ने बॉम्बे को मराठी-गुजराती द्विभाषी राज्य बनाने का प्रस्ताव दिया, जिसमें मराठवाड़ा, सौराष्ट्र और कच्छ शामिल थे। हालांकि, यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया गया।
- कांग्रेस का प्रस्ताव (1955): कांग्रेस ने महाराष्ट्र (विदर्भ सहित) और गुजरात (सौराष्ट्र और कच्छ सहित) को अलग करने और बॉम्बे को केंद्रीय प्रशासित क्षेत्र बनाने का सुझाव दिया। इस प्रस्ताव पर संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन सहमत नहीं हुआ। विरोध प्रदर्शनों में हिंसा भड़की, जिसमें गोलीबारी और लूटपाट हुई।
अंतिम विभाजन
हिंसा और राजनीतिक तनाव के कारण, केंद्र सरकार ने 1 मई 1960 को बॉम्बे राज्य को विभाजित कर महाराष्ट्र और गुजरात का गठन किया। बातचीत के बाद, गुजरात ने स्वीकार किया कि बॉम्बे महाराष्ट्र का हिस्सा होगा, क्योंकि वहां मराठी भाषी आबादी अधिक थी। बदले में, गुजरात को विवादित सीमावर्ती क्षेत्र और नई राजधानी के लिए वित्तीय सहायता दी गई।
वर्तमान स्थिति
आज, महाराष्ट्र और गुजरात दोनों 1 मई को अपना स्थापना दिवस मनाते हैं। मुंबई (पूर्व में बॉम्बे) भारत का पांचवां सबसे बड़ा गुजराती भाषी शहर है, जो गुजराती पूंजी और मराठी श्रम के ऐतिहासिक मेल का प्रतीक है।
बॉम्बे राज्य का विभाजन भारत के भाषाई पुनर्गठन का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। यह सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक टकरावों का परिणाम था, जिसने अंततः दो जीवंत राज्यों को जन्म दिया। आज, मुंबई दोनों समुदायों के सह-अस्तित्व का प्रतीक बना हुआ है।
स्रोत: स्टडी आईक्यू आईएएस के वीडियो और ऐतिहासिक दस्तावेज
नोट: लेख में प्रस्तुत छवियां काल्पनिक हैं और वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करने के लिए सुझाई गई हैं।