आज दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रही है। इसका मुख्य कारण है जीवाश्म ईंधन (कोयला, तेल, गैस) का अत्यधिक उपयोग, जो ग्रीनहाउस गैसें छोड़कर धरती का तापमान बढ़ा रहा है। इसके परिणामस्वरूप हिमाचल और उत्तराखंड में बाढ़, और देश के कुछ हिस्सों में सूखे जैसी चरम मौसमी घटनाएं बढ़ रही हैं। इस संकट से निपटने के लिए भारत “हरित ऊर्जा संक्रमण” की दिशा में तेजी से काम कर रहा है।
हरित ऊर्जा संक्रमण क्या है?
हरित ऊर्जा संक्रमण का मतलब है बिजली उत्पादन, भंडारण और उपयोग के तरीके को बदलना, ताकि कोयले और तेल जैसे जीवाश्म ईंधन की जगह सौर, पवन, जलविद्युत, और परमाणु ऊर्जा जैसे स्वच्छ स्रोतों का उपयोग बढ़े। यह पर्यावरण को बचाने और भविष्य को सुरक्षित करने का एक बड़ा कदम है।
भारत क्यों अपना रहा है हरित ऊर्जा?
भारत में हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने के तीन मुख्य कारण हैं:
- पर्यावरण की रक्षा: ग्लोबल वार्मिंग को रोकने के लिए भारत ने पेरिस समझौते के तहत वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने का वादा किया है। जीवाश्म ईंधन से होने वाला वायु प्रदूषण भी भारत के शहरों में एक बड़ी समस्या है।
- आर्थिक लाभ: भारत अपनी 85% तेल की जरूरत आयात से पूरी करता है, जिससे उसकी ऊर्जा सुरक्षा प्रभावित होती है। स्वच्छ ऊर्जा अपनाने से देश आत्मनिर्भर बन सकता है।
- अंतरराष्ट्रीय वादे: 2021 में ग्लासगो में हुए COP 26 सम्मेलन में भारत ने “पंचामृत लक्ष्य” की घोषणा की, जिसमें 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन (नेट जीरो) हासिल करने का वादा शामिल है।
पंचामृत लक्ष्य: भारत का संकल्प
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने COP 26 में भारत के पांच बड़े लक्ष्य रखे:
- 2030 तक 500 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता स्थापित करना।
- 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में 1 बिलियन टन की कमी करना।
- 2030 तक अर्थव्यवस्था की कार्बन तीव्रता को 45% कम करना।
- 2030 तक 50% बिजली अक्षय स्रोतों से उत्पादित करना।
- 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन हासिल करना।
भारत की प्रगति
भारत ने पिछले 10 सालों में अपनी अक्षय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना बढ़ाया है। 2014 में यह केवल 65 गीगावॉट थी, जो 2025 में बढ़कर 245 गीगावॉट हो गई है। आज भारत की कुल बिजली क्षमता का लगभग 50% अक्षय स्रोतों से आता है। फिर भी, 70% बिजली अभी भी कोयले और गैस जैसे जीवाश्म ईंधन से बनती है, क्योंकि सौर और पवन ऊर्जा हमेशा उपलब्ध नहीं होती।
सरकार के कदम
भारत सरकार हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए कई कदम उठा रही है:
- नीतियां: सरकार ने अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए नियम बनाए हैं, जैसे बिजली वितरण कंपनियों को अक्षय ऊर्जा खरीदने का आदेश और अक्षय ऊर्जा संयंत्रों को “मस्ट-रन” का दर्जा देना।
- वित्तीय मदद: सौर ऊर्जा में 100% विदेशी निवेश की अनुमति दी गई है और हरित बांड जारी किए जा रहे हैं।
- योजनाएं: पीएम कुसुम योजना, छत पर सौर पैनल के लिए सब्सिडी, और पेट्रोल-डीजल में बायोईंधन का मिश्रण जैसे कदम उठाए गए हैं।
- अनुसंधान: स्मार्ट ग्रिड, बैटरी भंडारण, और हरित हाइड्रोजन जैसी नई तकनीकों पर काम हो रहा है।
चुनौतियां
हरित ऊर्जा की राह में कुछ चुनौतियां भी हैं:
- जमीन की कमी: अक्षय ऊर्जा संयंत्रों के लिए बड़ी मात्रा में जमीन चाहिए, जो भारत जैसे घनी आबादी वाले देश में मुश्किल है।
- पैसों की जरूरत: 2070 तक नेट जीरो हासिल करने के लिए $10.1 ट्रिलियन की जरूरत होगी।
- बिजली की कमी: सौर और पवन ऊर्जा हमेशा उपलब्ध नहीं होती, इसलिए कोयले पर निर्भरता बनी हुई है।
- बेरोजगारी का डर: जीवाश्म ईंधन क्षेत्र में काम करने वाले लाखों लोगों की नौकरी खतरे में पड़ सकती है।
- बढ़ती मांग: 2047 तक भारत की ऊर्जा मांग 2.5 से 3 गुना बढ़ सकती है, जिसे स्वच्छ तरीके से पूरा करना एक चुनौती है।
न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण की जरूरत
हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते समय यह जरूरी है कि जीवाश्म ईंधन क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का ध्यान रखा जाए। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी होंगी, जो नौकरियों को बचाएं और समाज के हर वर्ग को इस बदलाव का लाभ मिले। इसे “न्यायसंगत ऊर्जा संक्रमण” कहा जाता है।
आगे की राह
भारत ने अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा अक्षय ऊर्जा उत्पादक देश है। लेकिन विश्व आर्थिक मंच के ऊर्जा संक्रमण सूचकांक में भारत की रैंक 2025 में 71वीं है, जो दिखाता है कि अभी और काम करने की जरूरत है। अगर भारत अपनी नीतियों और निवेश को और मजबूत करे, तो वह न केवल पर्यावरण की रक्षा करेगा, बल्कि एक टिकाऊ और आत्मनिर्भर भविष्य भी बनाएगा।
संपर्क: अधिक जानकारी के लिए, भारत सरकार की नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय की वेबसाइट (mnre.gov.in) या x.ai/grok पर जाएं।