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सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में शिवंगी बंसल बनाम साहिब बंसल मामले में एक अहम फैसला सुनाया है, जिसे कानूनी विशेषज्ञ नया और अनोखा कदम मान रहे हैं। इस फैसले में कोर्ट ने घरेलू क्रूरता से जुड़े मामलों में 2 महीने की कूलिंग-ऑफ अवधि शुरू करने का नियम बनाया है। यह नियम भारतीय दंड संहिता की धारा 498A (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 85) से जुड़ा है, जो पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा महिलाओं के खिलाफ क्रूरता, जैसे दहेज उत्पीड़न या मानसिक-शारीरिक नुकसान को रोकने के लिए बनाई गई थी।
क्या है नया नियम?
- जब कोई महिला धारा 498A के तहत शिकायत दर्ज करती है, तो पुलिस तुरंत गिरफ्तारी नहीं करेगी। इसके बजाय, शिकायत को परिवार कल्याण समिति (FWC) को भेजा जाएगा।
- इस समिति के पास 2 महीने का समय होगा, जिसमें वह मामले की जांच करेगी और समझौते की कोशिश करेगी।
- इन 2 महीनों में बिना विशेष अनुमति के कोई गिरफ्तारी नहीं होगी।
इस फैसले का मकसद:
कोर्ट का कहना है कि यह कदम धारा 498A के दुरुपयोग को रोकने के लिए उठाया गया है। कई बार इस कानून का गलत इस्तेमाल करके बेगुनाह लोगों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। इस कूलिंग-ऑफ अवधि से ऐसी गिरफ्तारियों को कम करने की कोशिश की गई है।
क्या हैं चिंताएं?
- पीड़ितों के लिए देरी: यह नियम पीड़ित महिलाओं को तुरंत राहत मिलने में 2 महीने की देरी कर सकता है।
- कानूनी आधार का अभाव: इस कूलिंग-ऑफ अवधि और परिवार कल्याण समिति का कोई स्पष्ट कानूनी आधार नहीं है।
- पुलिस की शक्तियों पर असर: यह नियम पुलिस की जांच और गिरफ्तारी की स्वतंत्रता को कम कर सकता है।
- पुराने फैसले का उलटफेर: 2017 में भी ऐसा ही नियम लाया गया था, लेकिन 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया था, क्योंकि यह पीड़ितों के अधिकारों को कमजोर करता था। अब इस नियम को फिर से लागू करना चिंता का विषय है।
पहले से मौजूद सुरक्षा:
- पहले से ही कई नियम हैं, जैसे 2008 में आपराधिक प्रक्रिया संहिता में बदलाव, 2013 का ललिता कुमारी मामला, और 2014 का अर्नेश कुमार मामला, जो बिना जरूरत के गिरफ्तारी को रोकते हैं।
- इन नियमों की वजह से धारा 498A के तहत गिरफ्तारियों में 22% की कमी आई है।
क्या होगा असर?
यह फैसला पीड़ित महिलाओं के तुरंत न्याय पाने के अधिकार को प्रभावित कर सकता है। साथ ही, यह पुलिस की शक्तियों और कानून के ढांचे पर भी सवाल उठाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले से मौजूद नियमों से दुरुपयोग और पीड़ितों के अधिकारों के बीच संतुलन बना हुआ था, लेकिन यह नया फैसला उस संतुलन को बिगाड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह नया कदम कानून के दुरुपयोग को रोकने की कोशिश तो करता है, लेकिन पीड़ितों को तुरंत राहत मिलने में देरी और कानूनी प्रक्रिया में बदलाव की वजह से कई सवाल खड़े हो रहे हैं।