इजराइल का बढ़ता अलगाव और गाजा में मानवीय संकट: एक बदलता वैश्विक परिदृश्य
इजराइल इस समय अंतरराष्ट्रीय मंच पर तेजी से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। वैश्विक समुदाय में उसकी स्थिति कमजोर हो रही है, और वह अपनी सुरक्षा और समर्थन के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) पर बहुत अधिक निर्भर हो गया है। लेकिन क्या होगा अगर यूएस भी उसका साथ छोड़ दे? यह सवाल आज इजराइल के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रहा है। गाजा में चल रहे संघर्ष और मानवीय संकट ने न केवल इजराइल की छवि को प्रभावित किया है, बल्कि वैश्विक स्तर पर उसके खिलाफ सवाल भी खड़े कर दिए हैं।
इजराइल का वैश्विक अलगाव
इजराइल को डर है कि अगर अमेरिका ने उसका समर्थन कम किया, तो उसे न केवल पश्चिमी देशों, बल्कि अरब और पूर्वी दुनिया का समर्थन भी खोना पड़ सकता है। अरब देशों में एकजुटता बढ़ रही है, और इस्लामिक देश भी इजराइल के खिलाफ एकजुट हो रहे हैं। इस बीच, इजराइल में एक आपातकालीन सरकार काम कर रही है, और युद्ध के समय में चुनाव कराना संभव नहीं है।
वैश्विक स्तर पर इजराइल की स्थिति को और कमजोर करने वाला एक बड़ा कारण है गाजा में मानवीय संकट। संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने गाजा में इजराइल की कार्रवाइयों को “नरसंहार” (जीनोसाइड) करार दिया है। गाजा में बुनियादी ढांचा और संसाधन लगभग खत्म हो चुके हैं, और इसे फिर से बनाने में कई साल लग सकते हैं। पहले जहां दुनिया “ज्यूस को बचाओ” का नारा लगाती थी, अब “गाजा को बचाओ” की मांग उठ रही है।
अमेरिका में बदलता माहौल
अमेरिका में भी इजराइल के प्रति समर्थन कम हो रहा है। 2022 में जहां केवल 42% अमेरिकी इजराइल के प्रति नकारात्मक रुख रखते थे, 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 53% हो गया है। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव नजदीक हैं, और “अमेरिका फर्स्ट” नीति फिर से चर्चा में है। कई अमेरिकी, खासकर युवा डेमोक्रेट्स, गाजा में मानवीय संकट को मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से देख रहे हैं। वे मानते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई जरूरी है, लेकिन पूरी आबादी को निशाना बनाना गलत है।
अमेरिका में प्रदर्शन और रैलियां हो रही हैं, जो इजराइल को दिए जा रहे “बिना शर्त समर्थन” पर सवाल उठा रही हैं। करदाता (टैक्सपेयर्स) पूछ रहे हैं कि उनका पैसा गाजा में विनाश के लिए क्यों इस्तेमाल हो रहा है। इसके अलावा, अमेरिका की रणनीतिक प्राथमिकताएं अब खाड़ी क्षेत्र, ईरान और इंडो-पैसिफिक की ओर शिफ्ट हो रही हैं, जिससे इजराइल को मिलने वाला समर्थन और कम हो सकता है।
वैश्विक और आर्थिक दबाव
अरब देशों की एकजुटता के कारण पूरा अरब विश्व अमेरिका के खिलाफ भी खड़ा हो रहा है। इसके साथ ही, कई देश पैलेस्टाइन को एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने लगे हैं। न्यूयॉर्क डिक्लेरेशन में 142 देशों ने दो-राष्ट्र समाधान (टू-स्टेट सॉल्यूशन) के पक्ष में वोट किया, जबकि केवल 12 देशों ने इजराइल का समर्थन किया। भारत भी उन 12 देशों में शामिल था।
आर्थिक रूप से भी इजराइल पर दबाव बढ़ रहा है। नॉर्वे ने 11 इजराइली कंपनियों से 2 ट्रिलियन डॉलर का निवेश वापस ले लिया है, और स्वीडन ने यूरोपीय प्रतिबंधों की मांग की है। इजराइल की अर्थव्यवस्था पर इसका असर दिख रहा है, और 60 हजार से अधिक लोग अपनी नौकरी गंवा चुके हैं।
इजराइल के अंदर विरोध की आवाजें
इजराइल के भीतर भी लोग सड़कों पर उतर आए हैं। टेल अवीव, हाइफा और जेरूसलम में हजारों लोग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। लोग प्रधानमंत्री नेतन्याहू पर “नैतिक अंधापन” और “लापरवाह युद्ध वृद्धि” का आरोप लगा रहे हैं। बंधकों के परिवार कह रहे हैं कि वे युद्ध नहीं, बल्कि शांति चाहते हैं।
होलोकास्ट की विडंबना
इजराइल ने हमेशा होलोकास्ट की स्मृति का इस्तेमाल अपनी वैधता के लिए किया है। “नेवर अगेन” (कभी फिर नहीं) का नारा ज्यूस के लिए एकजुटता का प्रतीक था, जिसका मतलब था कि वे फिर कभी नरसंहार का शिकार नहीं होंगे। लेकिन आज सवाल उठ रहा है कि क्या यह नारा केवल इजराइल के लिए है, या इसे फिलिस्तीन के लिए भी लागू करना चाहिए? एक बड़ी विडंबना यह है कि जो इजराइल कभी नरसंहार का शिकार था, आज वह खुद नरसंहार के आरोपों का सामना कर रहा है।
इजराइल का बढ़ता अलगाव और गाजा में मानवीय संकट ने वैश्विक समुदाय को सोचने पर मजबूर कर दिया है। क्या “नेवर अगेन” का संदेश सभी के लिए है, या यह केवल एक समुदाय तक सीमित है? इजराइल को अब न केवल बाहरी दबाव, बल्कि अपने ही देश के अंदर विरोध का सामना करना पड़ रहा है। वैश्विक समुदाय अब युद्धविराम और मानवीय सहायता की मांग कर रहा है, और यह देखना बाकी है कि इजराइल इस संकट से कैसे निपटता है।