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पिछले कुछ समय से लद्दाख में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन देखने को मिल रहे हैं। इसका मुख्य कारण है लद्दाख के लोगों की छठी अनुसूची में शामिल होने और राज्य का दर्जा पाने की मांग। लद्दाख, जो 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग होकर केंद्र शासित प्रदेश बना, अब अपने अधिकारों और स्थानीय शासन की मांग कर रहा है। आइए, आसान भाषा में समझते हैं कि ये मांगें क्या हैं, क्यों उठ रही हैं, और इनके क्या फायदे-नुकसान हो सकते हैं।
लद्दाख की चार मुख्य मांगें
लद्दाख के लोग सरकार से चार बड़ी मांगें कर रहे हैं:
- पब्लिक सर्विस कमीशन: स्थानीय लोगों को नौकरियों में प्राथमिकता मिले।
- दो संसदीय सीटें: वर्तमान में लद्दाख के पास सिर्फ एक सीट है, लोग इसे बढ़ाकर दो करना चाहते हैं।
- राज्य का दर्जा: लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश की जगह पूर्ण राज्य का दर्जा मिले।
- छठी अनुसूची में शामिल होना: इससे लद्दाख को स्वायत्त शासन की शक्ति मिलेगी।
छठी अनुसूची क्या है?
भारत के संविधान में अनुच्छेद 244 के तहत छठी अनुसूची का प्रावधान है। यह उन क्षेत्रों के लिए है जहां ज्यादातर आदिवासी (ट्राइबल) आबादी रहती है, जैसे कि असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के कुछ जिले। इस अनुसूची के तहत:
- स्थानीय लोग अपने क्षेत्र के लिए स्वायत्त परिषद (Autonomous District Council) बना सकते हैं।
- इन परिषदों को जमीन, जंगल, पानी, स्वास्थ्य, और स्थानीय पुलिस जैसे मामलों में अपने कानून बनाने की शक्ति मिलती है।
- यह आदिवासियों को उनकी संस्कृति, जमीन और परंपराओं को बचाने में मदद करता है।
वर्तमान में यह अनुसूची उत्तर-पूर्व के 10 जिलों में लागू है। लद्दाख, जहां 90-97% आबादी आदिवासी है, भी यही शक्तियां चाहता है।
लद्दाख क्यों चाहता है छठी अनुसूची?
2019 में जब लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया, तो लोगों ने इसे खुशी से स्वागत किया था। पहले जम्मू-कश्मीर के बजट का सिर्फ 2% ही लद्दाख को मिलता था। लेकिन अब लोगों को लगता है कि केंद्र शासित प्रदेश बनने से सारी शक्तियां दिल्ली के पास चली गई हैं। लेफ्टिनेंट गवर्नर के जरिए शासन होता है, और नौकरशाही (ब्यूरोक्रेसी) उनकी राह में रोड़ा बन रही है।
लद्दाख के लोग डरते हैं कि:
- बाहरी लोग उनकी जमीन खरीद सकते हैं।
- उनकी संस्कृति और परंपराएं खतरे में पड़ सकती हैं।
- स्थानीय लोगों को नौकरियां मिलने में मुश्किल हो सकती है।
छठी अनुसूची लागू होने से लद्दाख को अपने संसाधनों पर नियंत्रण मिलेगा, और उनकी संस्कृति, बौद्ध मठों, और कला को संरक्षण मिलेगा।
छठी अनुसूची के फायदे
- आदिवासी अधिकारों की रक्षा: बाहरी लोग लद्दाख में आसानी से जमीन नहीं खरीद पाएंगे, जिससे स्थानीय जनसांख्यिकी और संस्कृति सुरक्षित रहेगी।
- स्वायत्त शासन: लद्दाख के लोग अपने संसाधनों और विकास पर फैसले ले सकेंगे।
- पर्यावरण संरक्षण: लद्दाख की नाजुक पारिस्थितिकी को बचाने के लिए पर्यावरण-अनुकूल नीतियां बनाई जा सकेंगी।
- राजनीतिक स्थिरता: मांगें पूरी होने से लोगों का गुस्सा कम होगा, और वे सशस्त्र बलों के साथ बेहतर सहयोग कर सकेंगे।
चुनौतियां और आलोचनाएं
- राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल: लद्दाख का बॉर्डर पाकिस्तान और चीन से सटता है। कुछ लोग मानते हैं कि छठी अनुसूची से केंद्र सरकार की शक्तियां कम हो सकती हैं, जिससे रक्षा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं (जैसे सड़क, पुल) में देरी हो सकती है।
- आर्थिक नुकसान: बाहरी निवेश और पर्यटन उद्योग पर रोक लग सकती है, जो लद्दाख की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।
- शासन में मुश्किलें: स्वायत्त परिषदें केंद्र सरकार के फैसलों में अड़चन डाल सकती हैं।
केंद्र सरकार की स्थिति
छठी अनुसूची लागू होने पर भी रक्षा, सीमा नियंत्रण, और विदेश नीति जैसे बड़े मामले केंद्र सरकार के पास ही रहेंगे। केंद्र के पास अनुच्छेद 355 और आपातकाल जैसे अधिकार हैं, जिनसे वह जरूरत पड़ने पर स्वायत्त परिषद के फैसलों को बदल सकता है। लेकिन ऐसा करने से स्थानीय लोगों में नाराजगी बढ़ सकती है।
लद्दाख की मांगें उसकी संस्कृति, जमीन और अधिकारों को बचाने की कोशिश हैं। छठी अनुसूची और राज्य का दर्जा लद्दाख को अपने भविष्य पर ज्यादा नियंत्रण दे सकता है, लेकिन इसके साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास जैसे सवाल भी जुड़े हैं। सरकार को इन मांगों को संतुलित तरीके से देखना होगा, ताकि लद्दाख के लोगों का भरोसा भी जीता जाए और राष्ट्रीय हितों की रक्षा भी हो।