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भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) ने अपनी हालिया मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 5.5% पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है। यह लगातार दूसरी बार है जब केंद्रीय बैंक ने ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया है। आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास ने बुधवार को घोषणा की कि मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए नीतिगत दरों को स्थिर रखना उचित है।
इस निर्णय का उद्देश्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक विकास को समर्थन देने के बीच संतुलन बनाए रखना है। गवर्नर दास ने कहा, “वैश्विक और घरेलू आर्थिक अनिश्चितताओं को देखते हुए, हमारा ध्यान स्थिरता और विकास को बढ़ावा देने पर है।”
मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास पर नजर
पिछले कुछ महीनों में खुदरा मुद्रास्फीति (CPI) 4% के आसपास रही है, जो आरबीआई के 2-6% के लक्ष्य के भीतर है। हालांकि, खाद्य और ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव के कारण भविष्य में दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, भारत की जीडीपी वृद्धि दर इस वित्तीय वर्ष में 7% से अधिक रहने की उम्मीद है, जो वैश्विक स्तर पर मजबूत मानी जा रही है।
रेपो रेट का महत्व
रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों को अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है। इसका सीधा असर बैंकों की उधार दरों और आम जनता के लिए होम लोन, कार लोन और अन्य ऋणों की ब्याज दरों पर पड़ता है। रेपो रेट को स्थिर रखने से बैंकों की उधार लागत में कोई बदलाव नहीं होगा, जिसका मतलब है कि उपभोक्ताओं को फिलहाल ईएमआई में राहत या अतिरिक्त बोझ की उम्मीद नहीं है।
विशेषज्ञों की राय
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि आरबीआई का यह कदम अपेक्षित था, क्योंकि वैश्विक मंदी की आशंकाओं और घरेलू मांग को बनाए रखने की जरूरत के बीच सतर्क रुख अपनाना जरूरी था। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अगले कुछ महीनों में यदि मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहती है, तो दरों में कटौती की संभावना बढ़ सकती है।
अगली समीक्षा पर नजर
आरबीआई की अगली मौद्रिक नीति समीक्षा दिसंबर 2025 में होगी। तब तक वैश्विक आर्थिक परिदृश्य और घरेलू मांग के रुझानों पर कड़ी नजर रखी जाएगी। निवेशक और उपभोक्ता इस स्थिरता को सकारात्मक रूप में देख रहे हैं, क्योंकि यह अनिश्चितता के दौर में आर्थिक स्थिरता को बढ़ावा देता है।