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नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने शुक्रवार को 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा की, जिसमें वेनेजुएला की प्रमुख विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को चुना गया। यह पुरस्कार उन्हें “वेनेजुएला के लोगों के लिए लोकतांत्रिक अधिकारों को बढ़ावा देने के उनके अथक प्रयासों और तानाशाही से लोकतंत्र की ओर न्यायपूर्ण तथा शांतिपूर्ण संक्रमण के उनके संघर्ष” के लिए दिया गया है समिति के चेयरमैन जोर्गन वाटने फ्राइडनेस ने कहा, “यह पुरस्कार एक ऐसी महिला को दिया जा रहा है जो बढ़ती अंधेरे के बीच लोकतंत्र की ज्योति जलाए रखती है। मारिया कोरिना मचाडो लैटिन अमेरिका में हाल के समय की सबसे असाधारण सिविलियन साहस की मिसाल हैं।”
मारिया कोरिना मचाडो कौन हैं?
मारिया कोरिना मचाडो का जन्म 7 अक्टूबर 1967 को वेनेजुएला में हुआ था। वह एक औद्योगिक इंजीनियर हैं और वेनेजुएला की राजनीति में एक प्रमुख विपक्षी नेता के रूप में जानी जाती हैं। उन्होंने वोट निगरानी संगठन ‘सुमेटे’ (Súmate) की सह-स्थापना की, जो वेनेजुएला में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की दिशा में काम करता है। यह संगठन तत्कालीन राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज के शासन के खिलाफ लोकतंत्र की रक्षा का प्रतीक बन गया।
2010 में मचाडो को वेनेजुएला की राष्ट्रीय सभा के लिए चुना गया, जहां उन्होंने रिकॉर्ड संख्या में वोट हासिल किए। हालांकि, 2014 में उन्हें राजनीतिक कारणों से पद से हटा दिया गया। इसके बाद उन्होंने ‘वेंते वेनेजुएला’ (Vente Venezuela) विपक्षी पार्टी की स्थापना की और 2017 में ‘सोय वेनेजुएला’ गठबंधन का गठन किया, जो देश के विभिन्न राजनीतिक गुटों को लोकतंत्र के लिए एकजुट करता है।
तानाशाही के खिलाफ अथक संघर्ष
वेनेजुएला में राष्ट्रपति निकोलास मादुरो के शासन के खिलाफ मचाडो का संघर्ष दशकों पुराना है। 2023 के राष्ट्रपति चुनावों में वह विपक्ष की प्राथमिक उम्मीदवार चुनी गईं, लेकिन अदालत ने उन्हें उम्मीदवारी से अयोग्य ठहरा दिया। इसके बावजूद, उन्होंने इतिहासकार कोरिना योरिस को अपना स्थानांतरित उम्मीदवार बनाया, जो मादुरो के चुनावी नियंत्रण के खिलाफ एक विरोध का प्रतीक था।
2024 के विवादास्पद चुनावों के बाद, जहां विपक्ष ने एडमुंडो गोंजालेज को विजेता घोषित किया, मचाडो को अपनी जान का खतरा होने के कारण छिपकर रहना पड़ा। अगस्त 2024 में उन्होंने घोषणा की कि वह मादुरो सरकार के डर से गुप्त रूप से रह रही हैं। जनवरी 2025 में एक विपक्षी रैली में उनकी संक्षिप्त गिरफ्तारी हुई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण उन्हें रिहा कर दिया गया। मचाडो ने हमेशा शांतिपूर्ण संक्रमण की वकालत की है, लेकिन अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप का भी समर्थन किया है यदि आवश्यक हो।
नोबेल समिति ने कहा कि मचाडो ने अल्फ्रेड नोबेल की वसीयत के तीनों मानदंडों को पूरा किया है: राष्ट्रों के बीच भाईचारा, स्थायी सेनाओं का उन्मूलन और शांति कांग्रेसों का निर्माण। वह “गोलियों के बजाय मतपत्रों” का चुनाव करने वाली नेता हैं।
पुरस्कार की प्रतिक्रिया और वैश्विक प्रभाव
पुरस्कार की घोषणा के तुरंत बाद मचाडो ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर प्रतिक्रिया दी: “यह पुरस्कार मेरे लिए नहीं, बल्कि पूरे वेनेजुएला के लोकतंत्र आंदोलन के लिए है। हमारी स्वतंत्रता की लड़ाई जारी रहेगी।” नोबेल समिति के सचिव क्रिस्टियन बर्ग हार्विकेन ने बताया कि मचाडो ने फोन पर कहा, “यह अभिभूत करने वाला है। वेनेजुएला मुक्त होगा!”
विपक्षी नेता एडमुंडो गोंजालेज ने इसे “वेनेजुएला का पहला नोबेल” बताते हुए बधाई दी। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने इसे “वेनेजुएला के लोगों की स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की आकांक्षाओं” की मान्यता बताया।
यह पुरस्कार लैटिन अमेरिका से छठा नोबेल शांति पुरस्कार है और वेनेजुएला का पहला।
पुरस्कार की दौड़ में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का नाम भी चर्चा में था, जिन्होंने इजरायल-हमास युद्धविराम के लिए दावा किया था। लेकिन समिति ने मचाडो को चुना, जो वैश्विक लोकतंत्र के पतन पर चिंता का संकेत है।
भविष्य की उम्मीदें
मचाडो को 10 दिसंबर को ओस्लो में पुरस्कार समारोह में भाग लेने की चुनौती है, क्योंकि वह अभी भी छिपी हुई हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के निदेशक करीम हग्गाग ने कहा, “यह पुरस्कार दुनिया भर में लोकतंत्र की सेहत पर समिति की चिंता को दर्शाता है।”
मारिया कोरिना मचाडो की कहानी न केवल वेनेजुएला की है, बल्कि उन सभी देशों की है जहां तानाशाही लोकतंत्र को कुचलने की कोशिश कर रही है। उनका यह सम्मान आशा की किरण है कि साहस और अहिंसक संघर्ष अंततः विजयी होता है।