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भारत पिछले कुछ सालों से दुनिया के कई देशों और समूहों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) कर रहा है। इनका मुख्य मकसद भारतीय सामान को विदेशी बाजारों में आसानी से बेचना और व्यापार की रुकावटें कम करना है। लेकिन पुराने समझौतों से निर्यात उतना नहीं बढ़ा जितना उम्मीद थी, जबकि आयात तेजी से बढ़ गया। अब भारत इन समझौतों को सिर्फ व्यापार के लिए नहीं, बल्कि निवेश, तकनीक और भू-राजनीतिक मजबूती के लिए इस्तेमाल कर रहा है।
पुराने समझौतों की चुनौतियां
(Challenges from Older Agreements)
- आसियान (ASEAN): 2010 के समझौते के बाद भारत का निर्यात बढ़ा, लेकिन आयात उससे कहीं ज्यादा। नतीजा, व्यापार घाटा कई गुना बढ़ गया। हाल के आंकड़ों में यह घाटा 45 अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है।
- जापान: CEPA समझौते के बावजूद निर्यात स्थिर या कम रहा। वजह जापान के सख्त गुणवत्ता मानक, जिन्हें भारतीय कंपनियां पूरी नहीं कर पातीं। हालांकि, जापान से निवेश (FDI) और तकनीक ट्रांसफर जरूर बढ़ा है।
इनसे सबक लेकर भारत अब ज्यादा संतुलित समझौते कर रहा है।
सफल उदाहरण: यूएई
(Success Story: UAE)
संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के साथ 2022 का CEPA समझौता एक बड़ी कामयाबी है। दोनों देशों के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा है – गैर-तेल व्यापार FY25 में करीब 100 अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारतीय निर्यात में अच्छी बढ़ोतरी हुई, डिजिटल तरीकों से व्यापार आसान बना और व्यापार घाटा नियंत्रित रहा। यह समझौता दिखाता है कि सही दृष्टिकोण से FTA फायदेमंद हो सकते हैं।
नई दिशा: निवेश और रणनीतिक फायदे
(New Direction: Investment and Strategic Benefits)
अब भारत FTA को भू-राजनीतिक हथियार की तरह देख रहा है:
- EFTA (स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड, लिकटेंस्टीन): 2025 में लागू हुए इस समझौते में EFTA देशों ने 15 साल में 100 अरब डॉलर निवेश और 10 लाख नौकरियों का वादा किया है। यह भारत के लिए निवेश और रोजगार का बड़ा स्रोत बनेगा।
- ओमान और यूएई जैसे देश: ये अफ्रीका और रूस जैसे बाजारों तक पहुंचने का द्वार हैं।
- ब्रिटेन (UK): लोगों की आवाजाही, सामाजिक सुरक्षा जैसे मुद्दों पर फोकस।
भारत की छोटी-मोटी कंपनियां (MSME) कमजोर प्रतिस्पर्धा, महंगी लॉजिस्टिक्स और कुछ सामानों पर ऊंचे टैरिफ की वजह से पिछड़ रही हैं। लेकिन नए समझौते इन कमियों को दूर करने की कोशिश कर रहे हैं।
आत्मनिर्भर भारत का सही मतलब
(True Meaning of Atmanirbhar Bharat)
आत्मनिर्भरता का मतलब सिर्फ आयात बंद करना नहीं, बल्कि एक देश पर निर्भरता कम करके विकल्प बढ़ाना है। विविधीकरण से भारत मजबूत सप्लाई चेन बना रहा है।
एक सरल उदाहरण: ये व्यापार समझौते एक ‘एंट्री टिकट’ जैसे हैं। अभी मैदान में ज्यादा गोल (मुनाफा) नहीं हो रहे, लेकिन इस टिकट से क्लब की सदस्यता (मजबूत रिश्ते), बेहतर ट्रेनिंग (तकनीक) और बड़े टूर्नामेंट (वैश्विक प्रभाव) में जगह मिल रही है।
भारत के ये कदम दिखाते हैं कि व्यापार अब सिर्फ पैसा कमाने का जरिया नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर मजबूत होने का तरीका बन गया है। आने वाले सालों में इनका असर और साफ दिखेगा।