भारत की न्याय व्यवस्था में बड़ी समस्या है। अदालतों में लाखों-करोड़ों मामले लंबित हैं। इससे आम लोग, खासकर गरीब, बहुत परेशान हैं। न्याय में देरी होना मतलब न्याय न मिलना। लेकिन यह देरी सबके लिए एक समान नहीं है। गरीबों के लिए यह सजा बन जाती है, जबकि अमीरों के लिए सिर्फ एक छोटी असुविधा। आइए जानते हैं इस समस्या की जड़ें और प्रभाव।
पेंडिंग मामलों का बोझ: 5 करोड़ से ज्यादा केस इंतजार में
भारत की अदालतों में 5 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं। अगर हर मामले में दो पक्ष मानें, तो करीब 10 करोड़ लोग न्याय का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन असल में इससे ज्यादा प्रभावित हैं, क्योंकि कई मामलों में सरकार खुद मुकदमेबाज है। जिला अदालतों में 4.6 करोड़, हाई कोर्ट में 60-65 लाख और सुप्रीम कोर्ट में 90 हजार से ज्यादा केस पेंडिंग हैं।
ये मामले इतने पुराने हैं कि कुछ 30 साल से ज्यादा समय से लंबित हैं। इससे किसान अपनी जमीन के केस में फंस जाते हैं, महिलाएं गुजारा भत्ता का इंतजार करती रहती हैं, और निर्दोष आरोपी जेल में सड़ते रहते हैं। न्याय जब मिलता है, तो वह पुराना और बेकार हो चुका होता है। जैसे, आज जरूरत का गुजारा भत्ता 10 साल बाद मिले तो क्या फायदा?
गरीबों के लिए प्रक्रिया ही सजा क्यों बन जाती है?
कल्पना कीजिए, दो लोग अदालत जाते हैं। एक अमीर कार से आता है, उसके साथ वकील। दूसरा गरीब बस या पैदल आता है, हाथ में मोटी फाइल। अगर सुनवाई टल गई, तो अमीर के लिए यह छोटी बात है – ज्यादा फीस दे देगा। लेकिन गरीब के लिए यह बड़ा नुकसान: एक दिन की कमाई गई, किराया, उधार, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित।
कानून कागज पर सबके लिए बराबर है, लेकिन देरी गरीबों को दंडित करती है। यह तटस्थ नहीं है – यह अमीरों और शक्तिशाली लोगों का पक्ष लेती है। गरीब न सिर्फ केस हारता है, बल्कि समय और जिंदगी हार जाता है। अंडर ट्रायल कैदियों में गरीब, एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक ज्यादा हैं। जेलों में उनकी संख्या उनकी आबादी से ज्यादा है।
जजों की कमी और बजट का संकट
भारत में प्रति 10 लाख लोगों पर सिर्फ 15 जज हैं। अमेरिका में यह संख्या 150 है – 10 गुना ज्यादा। 1987 में विधि आयोग ने कहा था कि 10 लाख पर 50 जज होने चाहिए, लेकिन हम उससे पीछे हैं। जजों की वैकेंसी हर स्तर पर है – निचली अदालतों से सुप्रीम कोर्ट तक।
बजट भी बहुत कम: पूरा न्याय विभाग देश के बजट का सिर्फ 0.1% पाता है, यानी GDP का 0.01%। सिर्फ 12,000 करोड़ रुपये। इससे जजों को संसाधन नहीं मिलते – स्टाफ, मेंटेनेंस, सैलरी सब में समस्या। जज इतने व्यस्त रहते हैं कि एक दिन में 80-100 केस देखने पड़ते हैं। इससे न्याय की गुणवत्ता गिरती है। लगता है, सरकारों को फायदा है कि जज थक जाएं और कुशलता से काम न कर सकें।
संविधान का अनुच्छेद 21 तेज सुनवाई का अधिकार देता है, लेकिन पेंडिंग केस इसे मजाक बना देते हैं। जजों की स्वतंत्रता भी प्रभावित होती है, क्योंकि वे संसाधनों के लिए सरकार पर निर्भर हैं।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव: लोकतंत्र पर खतरा
यह देरी सिर्फ कानूनी नहीं, आर्थिक नुकसान भी है। व्यापारिक मामलों में इकोनॉमी प्रभावित होती है। सामाजिक असमानता बढ़ती है। हाशिए पर रहने वाले लोग न्याय व्यवस्था से भरोसा खो देते हैं। जब कानूनी रास्ते बंद होते हैं, तो लोग गैर-संवैधानिक तरीके अपनाते हैं। इससे रूल ऑफ लॉ कमजोर होता है।
नागरिकों का न्यायपालिका पर विश्वास टूटता है, जो लोकतंत्र की नींव है। लेकिन कोई बड़ा विरोध नहीं होता। मीडिया, यूट्यूबर या जनता इस पर बात नहीं करती। न्याय चुपचाप ढह रहा है, और कोई सुन नहीं रहा।
समाधान की जरूरत: क्या करें?
यह समस्या सिस्टमिक है – जजों की संख्या बढ़ाएं, बजट बढ़ाएं, प्रक्रिया सरल बनाएं। लोक अदालतें और ट्रिब्यूनल क्यों असफल हैं? क्योंकि संसाधन कम हैं। सरकार को ज्यादा खर्च करना चाहिए। क्या आपका कोई सुझाव है? जैसे, ज्यादा जज नियुक्ति, डिजिटल कोर्ट या बजट बढ़ोतरी। अगर न्याय नहीं बचा, तो लोकतंत्र कैसे बचेगा?