केंद्र सरकार ने हाल ही में चार नए श्रम संहिताओं (Labour Codes) को पूरे देश में लागू कर दिया है। ये संहिताएं पुराने 29 कानूनों को मिलाकर बनाई गई हैं। सरकार का कहना है कि इससे काम आसान होगा, व्यापार में सुविधा बढ़ेगी और मज़दूरों को बेहतर सुरक्षा मिलेगी। लेकिन कई विशेषज्ञ और मज़दूर संगठन इसे मज़दूरों के पुराने अधिकारों पर हमला बता रहे हैं। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि क्या-क्या बदला है।
1. मज़दूर किसे कहेंगे? परिभाषा में बड़ा बदलाव
पुराने कानूनों में ‘वर्कर’ या मज़दूर की परिभाषा काफी चौड़ी थी। अब नए कोड में अगर किसी की सैलरी 18,000 रुपये से ज्यादा है और वह सुपरवाइज़री या मैनेजमेंट रोल में है, तो उसे मज़दूर नहीं माना जाएगा।
इससे ऐसे कर्मचारियों को मिलने वाली कई कानूनी सुरक्षा (जैसे छंटनी से बचाव या यूनियन अधिकार) खत्म हो सकती है। सुपरवाइज़री रोल की साफ परिभाषा नहीं है, इसलिए कंपनियां आसानी से किसी को भी इस कैटेगरी में डाल सकती हैं।
2. यूनियन बनाना और हड़ताल करना अब बहुत मुश्किल
- यूनियन बनाने के लिए कम से कम 20% मज़दूरों का समर्थन चाहिए।
- bargaining (मोलभाव) का अधिकार तभी मिलेगा जब यूनियन के पास 50% मज़दूरों का सपोर्ट हो।
- हड़ताल के लिए 14 दिन पहले नोटिस देना ज़रूरी है। अगर बीच में सुलह की प्रक्रिया शुरू हो गई, तो हड़ताल नहीं हो सकती।
- बिना नियमों के हड़ताल करने पर जेल या भारी जुर्माना लग सकता है।
ये बदलाव हड़ताल को लगभग नामुमकिन बना देते हैं, जिससे मज़दूरों की आवाज़ दब सकती है।
3. नौकरी की सुरक्षा कमज़ोर, ‘हायर एंड फायर’ आसान
- पहले 100 कर्मचारियों वाली कंपनी को छंटनी के लिए सरकार से परमिशन लेनी पड़ती थी। अब ये सीमा 300 कर दी गई है। यानी 300 से कम वाले कर्मचारियों वाली कंपनियां बिना अनुमति के छंटनी कर सकती हैं।
- फिक्स्ड टर्म एंप्लॉयमेंट (निश्चित अवधि वाली नौकरी) को बढ़ावा दिया गया है। अब लोग 6-11 महीने के छोटे कॉन्ट्रैक्ट पर रखे जा सकते हैं।
परमानेंट जॉब का कॉन्सेप्ट कमज़ोर पड़ रहा है, जिससे नौकरी की स्थिरता खत्म हो सकती है। हालांकि फिक्स्ड टर्म वाले को भी परमानेंट जैसी सुविधाएं (जैसे ग्रेच्युटी) मिलेंगी, लेकिन कुल मिलाकर अनिश्चितता बढ़ेगी।
4. काम के घंटे और ओवरटाइम में लचीलापन
आम तौर पर 8 घंटे का काम माना गया है, लेकिन सरकार अब इसे 12 घंटे तक बढ़ा सकती है।
एक तिमाही (3 महीने) में ओवरटाइम 125 घंटे तक हो सकता है। ओवरटाइम पर दोगुनी सैलरी मिलेगी, लेकिन इतने लंबे घंटे मज़दूरों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकते हैं।
5. चार मुख्य श्रम संहिताएं क्या हैं?
सरकार ने पुराने कानूनों को मिलाकर ये चार कोड बनाए हैं:
- Code on Wages – वेतन से जुड़ा।
- Industrial Relations Code – यूनियन, हड़ताल, विवाद।
- Social Security Code – सामाजिक सुरक्षा (PF, ग्रेच्युटी आदि)।
- Occupational Safety, Health and Working Conditions Code – काम की सुरक्षा और हालात।
ये कोड गिग वर्कर्स (जैसे डिलीवरी बॉय) को भी कुछ सुरक्षा देने की कोशिश करते हैं, लेकिन परिभाषाएं उलझी हुई हैं।
6. अन्य चिंताएं
- नियोक्ताओं के लिए सजा कम कर दी गई है (जैसे इंस्पेक्टर को रोकने पर पहले 1 साल जेल थी, अब 6 महीने)।
- इंस्पेक्टर का नाम बदलकर फैसिलिटेटर कर दिया गया है, और वे बिना परमिशन के चेकिंग नहीं कर सकते।
- सामाजिक सुरक्षा या रजिस्ट्रेशन के लिए आधार अनिवार्य हो गया है।
सरकार का मकसद ‘ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस’ बढ़ाना है, यानी कंपनियों को आसानी देना। लेकिन मज़दूर संगठनों का कहना है कि इससे मज़दूरों के ऐतिहासिक अधिकार कमज़ोर हो रहे हैं, नौकरी की सुरक्षा घट रही है और उनकी गरिमा दांव पर लग गई है। संसदीय कमिटी की कई सलाहों को नज़रअंदाज़ किया गया है।
अब देखना ये है कि ये बदलाव असल में मज़दूरों के लिए फायदेमंद साबित होते हैं या सिर्फ कंपनियों के लिए।