आजकल दुनिया भर में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए नई-नई तकनीकें आ रही हैं। इनमें से एक है पानी पर तैरते सोलर पैनल, जो झीलों, नदियों और खदानों के पानी पर लगाए जाते हैं। ये पैनल न सिर्फ बिजली बनाते हैं बल्कि पर्यावरण को भी बचाते हैं। आइए जानते हैं इनकी मुख्य बातें।
जर्मनी में नया आविष्कार
जर्मनी के गिल्शिंग शहर में एक पुरानी रेत-बजरी की खदान में 2600 सोलर पैनल लगाए गए हैं। ये पैनल पानी पर तैरते हैं और सुबह, दोपहर, शाम हर समय सूरज की रोशनी से बिजली बनाते हैं। इस तरह पूरे दिन काम चलता रहता है।

कैसे बनाए जाते हैं ये पैनल?
ये सोलर पैनल फोटोवोल्टिक तकनीक पर काम करते हैं और प्लास्टिक के फ्लोटर्स पर टिके रहते हैं। हवा चलने पर ये नाव की तरह झुक जाते हैं, जिससे उन पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ता। झील के दोनों किनारों पर रस्सियां बांधकर इन्हें मजबूती से पकड़ा जाता है। इससे कम सामान लगता है और खर्चा भी कम होता है।

कितनी बिजली बनाते हैं?
यह प्लांट हर साल 2000 मेगावॉट घंटे बिजली पैदा कर सकता है। यह खदान की कुल बिजली जरूरत का दो-तिहाई हिस्सा पूरा कर देता है। मतलब, कम जगह में ज्यादा फायदा।
घाना में भी फैल रही है यह तकनीक
यह तकनीक सिर्फ जर्मनी तक सीमित नहीं है। अफ्रीका के घाना देश में ब्लैक वोल्टा नदी पर एक बड़ा फ्लोटिंग सोलर फार्म बनाया गया है। यह अभी 5 मेगावॉट बिजली बना रहा है, जो 40 हजार लोगों वाले शहर की बिजली जरूरत पूरी कर सकता है। यहां फ्लोटर्स को रखरखाव के लिए रास्ते की तरह भी इस्तेमाल किया जाता है।

मुख्य फायदे क्या हैं?
पानी पर होने से ये पैनल ठंडे रहते हैं, जिससे उनकी क्षमता बढ़ जाती है और ज्यादा बिजली बनती है। दुनिया भर में फ्लोटिंग सोलर फार्म तेजी से बढ़ रहे हैं। हाल के सालों में इनकी क्षमता 10 मेगावॉट से 77 मेगावॉट हो गई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी का कहना है कि 2030 तक सौर ऊर्जा दुनिया की नवीकरणीय ऊर्जा का 78% हिस्सा होगी। जर्मनी में अभी ये कम हैं, लेकिन खदानों के लिए यह हरा-भरा भविष्य ला सकता है।
यह तकनीक पर्यावरण के लिए अच्छी है और भविष्य में और फैलने वाली है।