वियतनाम युद्ध इतिहास की एक ऐसी घटना है जो आज भी दुनिया को सबक देती है। यह युद्ध लगभग 20 साल तक चला और इसमें लाखों लोगों की जान गई। अमेरिका जैसी महाशक्ति को एक छोटे देश ने हरा दिया। आइए जानते हैं इस युद्ध की पूरी कहानी सरल शब्दों में।
युद्ध की शुरुआत: फ्रांस का शासन और जापान का हमला
1850 के दशक में फ्रांस ने वियतनाम पर कब्जा कर लिया था। इसे ‘फ्रेंच इंडोचाइना’ कहा जाता था, जिसमें वियतनाम के अलावा कंबोडिया और लाओस भी शामिल थे। फ्रांस यहां व्यापार और संसाधनों के लिए आया था। दूसरे विश्व युद्ध में, 1940 में जापान ने वियतनाम पर हमला किया ताकि चीन की मदद रोक सके। जापान ने फ्रांसीसी शासन को तो रखा, लेकिन उनकी ताकत कम कर दी। 1945 में जापान हार गया, तो फ्रांस ने फिर से कब्जा करने की कोशिश की। लेकिन वियतनामी लोगों ने आजादी की लड़ाई शुरू कर दी।
हो ची मिन्ह: आजादी के नायक

हो ची मिन्ह, जिनका असली नाम नगुएन टैट थान था, वियतनाम की आजादी के बड़े नेता थे। वे कम्युनिस्ट विचारों से प्रभावित थे। 1941 में उन्होंने ‘वियत मिन्ह’ नाम का संगठन बनाया, जो फ्रांस के खिलाफ लड़ता था। 1945 में जापान के हटते ही हो ची मिन्ह ने उत्तरी वियतनाम को आजाद घोषित कर दिया। उन्होंने लोगों को एकजुट किया और गोरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई, जिसमें दुश्मन पर छिपकर हमला किया जाता था। हो ची मिन्ह की वजह से वियतनामी लोग मजबूती से लड़े।
वियतनाम का विभाजन और अमेरिका का डर
1954 में जिनेवा समझौते से वियतनाम को दो हिस्सों में बांट दिया गया: उत्तर वियतनाम (कम्युनिस्ट, हो ची मिन्ह के नेतृत्व में) और दक्षिण वियतनाम (फ्रांस और अमेरिका समर्थित)। विभाजन 17वीं समानांतर रेखा से हुआ। अमेरिका को डर था कि अगर वियतनाम कम्युनिस्ट बना, तो यह विचार पूरे एशिया में फैल जाएगा। इसे ‘डोमिनो थ्योरी’ कहा जाता था। 1955 में अमेरिका ने दक्षिण वियतनाम में अपने समर्थक नगो दिन जेम को राष्ट्रपति बनाया, जो कम्युनिस्टों का दमन करता था।
अमेरिका का युद्ध में कूदना: गल्फ ऑफ टोंकिन घटना
1964 में गल्फ ऑफ टोंकिन में अमेरिकी जहाज पर हमला हुआ, जिसके बाद अमेरिका ने खुलकर युद्ध में हिस्सा लिया। राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने सेना भेजी। अमेरिका ने ‘ऑपरेशन रोलिंग थंडर’ में उत्तरी वियतनाम पर लाखों टन बम गिराए। 1967 तक वहां 5 लाख से ज्यादा अमेरिकी सैनिक थे।
युद्ध की भयानकता: नेपाम, एजेंट ऑरेंज और गोरिल्ला वार

अमेरिका ने आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल किया। उन्होंने ‘नेपाम’ बम और ‘एजेंट ऑरेंज’ नामक रसायन छिड़का, जो जंगलों को नष्ट कर देता था। इससे लाखों वियतनामी लोगों को कैंसर जैसी बीमारियां हुईं, जो आज भी जारी हैं। दूसरी तरफ, वियतनामी सैनिक (वियत कोंग) गोरिल्ला युद्ध में माहिर थे। उन्होंने 200 मील लंबी सुरंगें बनाईं, जहां अस्पताल और हथियार रखते थे। वे छिपकर हमला करते और अमेरिकियों को परेशान करते।
युद्ध में अमेरिका ने द्वितीय विश्व युद्ध से ज्यादा बम गिराए। लेकिन वियतनामी लोगों की हिम्मत ने उन्हें हराया। 1968 के टेट ऑफेंसिव में वियत कोंग ने बड़े शहरों पर हमला किया, जिससे अमेरिका में विरोध बढ़ा। मायलाई गांव में अमेरिकी सैनिकों ने 500 निर्दोष लोगों को मार दिया, जिसकी खबर से दुनिया में हंगामा मच गया।
अमेरिका में विरोध और सेना की वापसी
अमेरिका में युद्ध के खिलाफ बड़े प्रदर्शन हुए। ‘पेंटागन पेपर्स’ लीक और एक लड़की किम फुक की जलती हुई तस्वीर ने लोगों को हिला दिया। राष्ट्रपति रिचर्ड निकसन ने ‘वियतनामाइजेशन’ नीति अपनाई, जिसमें दक्षिण वियतनाम की सेना को जिम्मेदारी दी गई। 1973 के पेरिस समझौते से अमेरिका ने सेना वापस बुलाई।
युद्ध का अंत: साइगॉन का पतन

30 अप्रैल 1975 को उत्तरी वियतनाम की सेना ने दक्षिण की राजधानी साइगॉन पर कब्जा कर लिया। अमेरिकी लोग हेलीकॉप्टर से भागे। 1976 में दोनों हिस्से मिलकर ‘सोशलिस्ट रिपब्लिक ऑफ वियतनाम’ बने और साइगॉन का नाम ‘हो ची मिन्ह सिटी’ रखा गया।
नुकसान और सबक
युद्ध में अमेरिका के 58,220 सैनिक मारे गए, जबकि वियतनाम में 20 लाख से ज्यादा नागरिक और सैनिक हताहत हुए। यह युद्ध दिखाता है कि टेक्नोलॉजी से ज्यादा हिम्मत और रणनीति मायने रखती है। आज वियतनाम एक तेजी से बढ़ता देश है, लेकिन युद्ध के घाव अभी भी हैं। दुनिया ने सीखा कि शांति से ही समस्याएं हल होती हैं, और छोटा देश भी बड़ी ताकत को हरा सकता है।
यह युद्ध कोल्ड वॉर का हिस्सा था, जहां अमेरिका और सोवियत संघ के बीच टकराव था। आज भी फिल्में और किताबें इस पर बनती हैं, जैसे ‘अपोकैलिप्स नाउ’।