भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए व्यापार समझौते ने देश के किसानों को फिर से सड़कों पर उतार दिया है। संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) और अन्य किसान संगठनों ने इस डील को “अमेरिका के सामने पूर्ण आत्मसमर्पण” बताते हुए 12 फरवरी को राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया है। किसानों का कहना है कि यह समझौता उनके लिए घातक साबित होगा, जबकि सरकार इसे अर्थव्यवस्था के लिए फायदेमंद बता रही है।

यह समझौता 6 फरवरी 2026 को घोषित किया गया था, जिसमें दोनों देशों ने कुछ उत्पादों पर टैरिफ (सीमा शुल्क) कम करने पर सहमति जताई। अमेरिका ने भारत के निर्यात पर लगे 50% टैरिफ को घटाकर 18% कर दिया है, जिससे भारतीय निर्यातकों को फायदा होगा। बदले में, भारत ने अमेरिकी कृषि उत्पादों जैसे ट्री नट्स (जैसे बादाम, अखरोट), ताजे और प्रोसेस्ड फल, सोयाबीन तेल और ड्राई डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGS, जो पशु चारे में इस्तेमाल होता है) पर टैरिफ कम या जीरो कर दिया है। इससे द्विपक्षीय व्यापार में 30 बिलियन डॉलर की बढ़ोतरी की उम्मीद है, जो भारतीय किसानों और उद्यमियों के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है।
लेकिन किसान संगठन इससे खुश नहीं हैं। उनका आरोप है कि अमेरिका में किसानों को भारी सब्सिडी मिलती है, जिससे उनके उत्पाद बहुत सस्ते होते हैं। जब ये सस्ते उत्पाद भारतीय बाजार में आएंगे, तो स्थानीय किसान उनसे मुकाबला नहीं कर पाएंगे और उनका कारोबार चौपट हो जाएगा। खासतौर पर छोटे और सीमांत किसान, जो भारत के 86% किसानों का हिस्सा हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। किसानों को डर है कि डेयरी और अन्य क्षेत्रों पर भी अप्रत्यक्ष असर पड़ेगा, भले ही सरकार ने गेहूं, चावल, मक्का, डेयरी और पोल्ट्री जैसे संवेदनशील उत्पादों को डील से बाहर रखा है।

SKM के नेताओं ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के इस्तीफे की मांग की है। उनका कहना है कि मंत्री ने किसानों को गुमराह किया और डील के विवरण में विरोधाभास हैं। किसान चाहते हैं कि सरकार इस समझौते पर साइन न करे और संसद में इसे मंजूरी न दे। वे इसे अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के फायदे के लिए भारत की कृषि को सौंपने जैसा बता रहे हैं। इसके अलावा, जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) अनाज के आयात का खतरा भी उठाया जा रहा है, जो भारतीय कृषि की जैव विविधता को नुकसान पहुंचा सकता है।
सरकार की ओर से मंत्री गोयल ने कहा है कि उन्होंने किसानों के हितों को आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया है और संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी डील को किसानों और एमएसएमई के लिए नए अवसरों का स्रोत बताया है। लेकिन किसान यूनियनें इसे मानने को तैयार नहीं हैं और 12 फरवरी को बड़े पैमाने पर प्रदर्शन करने की तैयारी कर रही हैं।

यह विवाद 2020-21 के किसान आंदोलन की याद दिलाता है, जब कृषि कानूनों के खिलाफ लाखों किसान दिल्ली बॉर्डर पर डटे थे। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह विरोध बढ़ा, तो आगामी चुनावों से पहले सरकार पर दबाव बढ़ सकता है। फिलहाल, दोनों पक्षों के बीच बातचीत की कोई खबर नहीं है, लेकिन किसान संगठन मजदूरों के साथ मिलकर सामान्य हड़ताल का भी आह्वान कर सकते हैं।
यह समझौता दोनों देशों के रिश्तों को मजबूत तो करेगा, लेकिन भारतीय कृषि क्षेत्र पर इसका क्या असर पड़ेगा, यह आने वाले दिनों में साफ होगा। किसानों की मांगें पूरी न हुईं तो आंदोलन और तेज हो सकता है।