छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में पिछले 40 सालों से नक्सलियों के साथ जंग चल रही है। यहां की जंगलों और पहाड़ों को ‘बैटल फील्ड’ कहा जाता है। लेकिन अब इस जंग में महिलाएं भी आगे आ रही हैं। 2021 में पहली बार सरकार ने गोरिल्ला वॉर में महिलाओं को शामिल किया। ये बस्तर फाइटर नाम की बहादुर लड़कियां हैं, जो स्थानीय आदिवासी समुदाय से आती हैं। ये डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG) में काम करती हैं और नक्सलियों के खिलाफ सीधी लड़ाई लड़ती हैं। सुकमा जिले में तैनात ये महिलाएं नक्सल-मुक्त कैंप बनाती हैं और इलाकों को सुरक्षित बनाती हैं। एक फाइटर ने कहा, “नक्सली जबरदस्ती हथियार थमाते हैं, लेकिन हम अपनी मर्जी से देश की सेवा के लिए आई हैं। वर्दी पहनना मेरा बचपन का सपना था।”
जंगलों की चुनौतियां: डर से आगे बहादुरी
इन महिलाओं के ऑपरेशन आसान नहीं होते। जंगलों में नदियां, नाले, पगडंडियां और ऊंचे पहाड़ मिलते हैं। कभी-कभी तो साथी की कमर पकड़कर पहाड़ चढ़ना पड़ता है। एक फाइटर ने बताया, “पहले ऑपरेशन में डर से पसीना छूट गया था, लेकिन अब बिल्कुल डर नहीं लगता।” तीन दिन के लंबे ऑपरेशन (LOP) में वे 5-6 किलो का सामान और 10 किलो की राइफल लादकर चलती हैं। बैग में कढ़ाई, कपड़े, बेडशीट, 6 लीटर पानी और दो दिन का राशन होता है। राशन को तीन दिन तक बचाना पड़ता है। वे इमली का पानी मिलाकर चावल बनाती हैं, जो खराब नहीं होता। एक फाइटर ने अपना नक्सली साबुन दिखाया, जो ऑपरेशन में लूटा था।
मासिक धर्म के दौरान भी वे रुकती नहीं। “पहले बाधा लगती थी, लेकिन अब आदत हो गई,” एक कमांडो ने कहा। वे सैनिटरी नैपकिन साथ रखती हैं और जंगल में ही बदलाव करती हैं। दर्द होने पर भी टीम को नहीं रोकतीं। बस्तर फाइटर होना इनके लिए गर्व की बात है।
परिवार का दर्द: मां की आंखों में आंसू, बेटियों का हौसला
ये लड़कियां घर से दूर रहकर जंग लड़ती हैं, लेकिन परिवार का साथ हमेशा याद रहता है। एक फाइटर ने बताया, “भर्ती का फॉर्म भरते समय मां-पापा को नहीं बताया। सिलेक्शन के बाद 15 दिन तक झूठ बोला कि खेलने जा रही हूं। जब सच बताया, तो मां रो पड़ीं। बोलीं, ‘मरने वाली जगह क्यों गई? नक्सली मार देंगे।'” बचपन में नक्सली गांव आते थे और पूछते थे कि पढ़कर क्या बनोगी? मां ने सिखाया था झूठ बोलो, ‘डॉक्टर बनूंगी’। लेकिन दिल में वर्दी पहनने का सपना था।
एक अन्य फाइटर पिंकी ने कहा, “हमारे इलाके में माओवादी अभी भी आते हैं। मां गांव वालों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करती थीं, तो नक्सलियों ने उन्हें गांव से निकाल दिया। अब नानी के घर रहते हैं।” ये महिलाएं मां को ऑपरेशन की तकलीफें नहीं बतातीं, क्योंकि मां को दर्द होता है। एक बार मां ने कहा, “नौकरी छोड़ आ जाओ।” लेकिन घर में कोई कमाने वाला नहीं, इसलिए जारी रखना पड़ता है।
बस्तर का सपना: नक्सल-मुक्त इलाका, विकास की नई सुबह
नक्सलवाद कम होने से बदलाव आ रहा है। लोग अब बच्चों को नक्सली नहीं बनने देते, बल्कि बाहर पढ़ाते हैं। लेकिन अंदरूनी इलाकों में अभी भी पानी, खाना और दवाओं की कमी है। बच्चे बीमार पड़ते हैं और दवाइयां मांगते हैं। फाइटर्स कहती हैं, “लोगों को यह भी नहीं पता कि क्या खाने लायक है।” उनका सपना है कि नक्सलवाद खत्म हो, बस्तर नक्सल-मुक्त बने। यहां विकास आए, स्कूल-हॉस्पिटल बनें और लोग पढ़-लिखकर अच्छी जिंदगी जिएं। “बस्तर को सिर्फ नक्सल या अशिक्षित न कहें। हमारा टैलेंट और आदिवासी जीवन हमारी असली पहचान है,” एक फाइटर ने कहा।
ये कहानी ‘Jist’ यूट्यूब चैनल के एक वीडियो से ली गई है, जो इन बहादुर महिलाओं की जज्बे को बयां करती है। बस्तर की ये बेटियां न सिर्फ नक्सलियों से लड़ रही हैं, बल्कि अपने इलाके को नई उम्मीद दे रही हैं।