आजकल बच्चे मोबाइल और कंप्यूटर पर ऑनलाइन गेम खेलने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि यह उनके लिए एक बड़ी समस्या बन रही है। हाल ही में गाजियाबाद में तीन छोटे बच्चों ने ऑनलाइन गेमिंग की वजह से खुद को नुकसान पहुंचाया, जिससे सबको चिंता हो गई है। एक सर्वे में पता चला है कि शहरों में 66% माता-पिता मानते हैं कि उनके 9 से 17 साल के बच्चे सोशल मीडिया या ऑनलाइन गेम के आदी हो चुके हैं।

गेम क्यों इतने आकर्षक लगते हैं?
ऑनलाइन गेम बच्चों को जीतने का मजा देते हैं। गेम में हर समय पॉइंट्स, रैंकिंग और फीडबैक मिलता रहता है, जिससे दिमाग में डोपामिन नाम का केमिकल निकलता है। इससे बच्चे बाहर खेलने या पढ़ने की बजाय गेम में ही खुशी ढूंढने लगते हैं। लेकिन जब गेम सिर्फ मजा नहीं बल्कि भावनाओं का सहारा बन जाता है, तो समस्या बढ़ जाती है। एक अध्ययन के मुताबिक, 34% किशोर चिंता या दुख से बचने के लिए गेम खेलते हैं, खासकर अगर घर में तनाव हो।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर
अगर बच्चा गेम से दूर होने पर गुस्सा करता है, दोस्तों से दूर रहता है, नींद नहीं आती या पढ़ाई में मन नहीं लगता, तो यह खतरे की घंटी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म्स का सिस्टम ऐसा है कि अगर कोई बच्चा गलत चीजें देखता है, जैसे खुद को नुकसान पहुंचाने वाली बातें, तो वही चीजें बार-बार दिखाई जाती हैं। इससे बच्चे का दिमाग कमजोर हो जाता है। सर्वे बताते हैं कि 9% बच्चे खुद को ‘डिजिटल’ तरीके से सजा देने की कोशिश करते हैं।

इससे कैसे बचाएं?
बच्चों को इन खतरों से बचाने का सबसे अच्छा तरीका है अच्छी पैरेंटिंग। माता-पिता को बच्चों की बातें ध्यान से सुननी चाहिए, ताकि उनका आत्मविश्वास बढ़े। सीधे रोकने की बजाय साथ में नियम बनाएं, जैसे गेम खेलने का समय तय करें और खुद भी उनके साथ खेलें। इस तरह बच्चे सुरक्षित रहेंगे।
