आल्प्स पर्वतों को यूरोप का ‘जल भंडार’ कहा जाता है। यहां से महाद्वीप को लगभग 40 प्रतिशत साफ पानी मिलता है। ये पर्वत नदियों और झीलों को पानी देते हैं, जो यूरोप के कई देशों के लिए जरूरी हैं। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन की वजह से यहां की स्थिति खराब हो रही है। जर्मनी की आउग्सबुर्ग यूनिवर्सिटी की एक टीम इस इलाके में पानी के संतुलन पर रिसर्च कर रही है। उनका कहना है कि तापमान या बारिश में थोड़ा सा भी बदलाव पूरे इलाके की नदियों और पानी की सप्लाई को प्रभावित कर सकता है, खासकर बवेरिया जैसे क्षेत्रों में।

वैज्ञानिकों की रिसर्च से कई चिंताजनक बातें सामने आई हैं। सबसे पहले, पिछले 10 सालों में आल्प्स में तापमान करीब 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। इस गर्मी की वजह से पानी का भाप बनकर उड़ना (वाष्पीकरण) बढ़ रहा है। इससे जमीन में पानी कम पहुंच रहा है, और भूजल के साथ-साथ नदियों का स्तर भी गिर रहा है। यह समस्या सिर्फ आल्प्स तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी नदियां जैसे राइन नदी भी प्रभावित हो रही हैं।

दूसरी बड़ी समस्या बारिश के तरीके में बदलाव है। गर्मियों में, जब पानी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, बारिश बहुत कम हो रही है। आंकड़ों से पता चलता है कि यह बदलाव पूरे आल्प्स क्षेत्र में हो रहा है, और इससे किसानों, शहरों और उद्योगों को पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। हाल के सालों में यूरोप में आई हीटवेव्स ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है, जहां कई जगहों पर सूखे की स्थिति बनी है।

तीसरा, बर्फ का समय से पहले पिघलना। स्विट्जरलैंड के वैज्ञानिकों का कहना है कि मार्च महीने में ही बर्फ पिघलने लग रही है, जबकि पहले यह ज्यादा समय तक बनी रहती थी। नदियों के लिए ग्लेशियरों से ज्यादा महत्वपूर्ण बर्फ के मैदान हैं। उदाहरण के तौर पर, राइन नदी में पहुंचने वाले पानी का सिर्फ 2 प्रतिशत ग्लेशियरों से आता है, जबकि दो-तिहाई पानी बर्फ के पिघलने से मिलता है। अगर बर्फ कम हो गई या जल्दी पिघल गई, तो गर्मियों में पानी की कमी हो सकती है।

भविष्य में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि राइन नदी के जल स्तर में 20 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। इससे यूरोप के बड़े हिस्सों में पानी की सप्लाई प्रभावित होगी, जो पीने के पानी से लेकर बिजली बनाने और जहाजों की आवाजाही तक सबको असर डालेगी। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कार्बन उत्सर्जन कम नहीं किया गया, तो 2050 तक आल्प्स के 80 प्रतिशत ग्लेशियर गायब हो सकते हैं, जो पूरे महाद्वीप के लिए बड़ा खतरा है।

यह समस्या सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था और लोगों की जिंदगी से जुड़ी है। यूरोप के देशों को अब पानी बचाने के नए तरीके अपनाने होंगे, जैसे बेहतर जल प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय समझौते।