हर साल हजारों भारतीय छात्र बेहतर पढ़ाई और नौकरी के सपनों के साथ जर्मनी आते हैं। लेकिन यहां पहुंचकर उन्हें शोषण, पैसे की तंगी और मुश्किल जिंदगी का सामना करना पड़ता है। पिछले पांच सालों में भारत से जर्मनी आने वाले छात्रों की संख्या दोगुनी हो गई है, और अब यह आंकड़ा 50,000 से ज्यादा पहुंच चुका है। सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले चमकदार विज्ञापनों ने इन युवाओं को लुभाया है, लेकिन हकीकत कुछ और ही है।

जर्मनी क्यों बन रहा है सपनों का जाल?
भारतीय छात्र जर्मनी में दो तरीकों से आते हैं। एक है सरकारी यूनिवर्सिटी, जहां फीस कम है लेकिन एडमिशन मुश्किल। दूसरा है प्राइवेट कॉलेज, जहां एडमिशन आसान है लेकिन फीस बहुत ज्यादा। इंस्टाग्राम रील्स और व्हाट्सएप मैसेज में डेटा साइंस जैसी पढ़ाई के बाद लाखों की सैलरी और शानदार जीवन के सपने दिखाए जाते हैं। लेकिन असल में, कई छात्रों को अपनी डिग्री के मुताबिक नौकरी नहीं मिलती। वे फूड डिलीवरी या छोटे-मोटे कामों में फंस जाते हैं।
पैसे की तंगी और ब्लॉक्ड अकाउंट का बोझ
जर्मनी आने से पहले छात्रों को ‘ब्लॉक्ड अकाउंट’ में कम से कम 11,904 यूरो (करीब 10 लाख रुपये) जमा करने पड़ते हैं। ज्यादातर छात्र कर्ज लेकर यह पैसा जुटाते हैं। यहां आने के बाद वे हर महीने सिर्फ 992 यूरो ही निकाल सकते हैं। यह पैसा उनकी फीस में ही खत्म हो जाता है। घर का किराया, खाना-पीना और रोजमर्रा के खर्च के लिए उन्हें पार्ट-टाइम जॉब करनी पड़ती है। कई छात्र भारत में अच्छी नौकरियां छोड़कर आते हैं, जैसे फाइनेंशियल एनालिस्ट, लेकिन यहां वे कर्ज के जाल में फंस जाते हैं।
मकानों की कमी, रहने की मुश्किल
बर्लिन जैसे बड़े शहरों में घर मिलना बहुत मुश्किल है। छात्रों को महंगे किराए वाले छोटे कमरे मिलते हैं, जो वे कई लोगों के साथ शेयर करते हैं। कभी-कभी संदिग्ध शर्तों पर घर मिलता है, जहां कोई सुरक्षा नहीं होती। जर्मनी की सरकार भी इस समस्या से जूझ रही है, और हर साल लाखों नए घर बनाने की कोशिश कर रही है, लेकिन कमी बनी हुई है।
फूड डिलीवरी में शोषण का खेल
जब पढ़ाई के मुताबिक जॉब नहीं मिलती, तो छात्र वोल्ट, उबर ईट्स जैसी कंपनियों में फूड डिलीवरी का काम करते हैं। लेकिन यहां शोषण की पूरी व्यवस्था है। छात्र सीधे कंपनी के कर्मचारी नहीं होते, बल्कि सब-कॉन्ट्रैक्टर के जरिए काम करते हैं। संपर्क सिर्फ व्हाट्सएप पर होता है। वे रोज 10-12 घंटे काम करते हैं, और अगर ऑनलाइन न रहें तो काम से निकालने की धमकी मिलती है। 12 घंटे की मेहनत के बाद भी सिर्फ 80-90 यूरो (करीब 7,000 रुपये) मिलते हैं।
भुगतान अक्सर कैश में गलियों में दिया जाता है, और वो भी वादे से कम। सब-कॉन्ट्रैक्टर टैक्स बचाने के लिए कंपनियां बंद कर नई बना लेते हैं। कानूनी तौर पर राइडर्स और कंपनियों के बीच कोई सीधा रिश्ता नहीं, इसलिए शिकायत करना मुश्किल। टैक्स अधिकारी अक्सर सड़क पर काम करने वाले प्रवासियों को पकड़ते हैं, जिससे डिपोर्टेशन का डर रहता है।

कंपनियों का क्या कहना है?
उबर ईट्स और वोल्ट कहती हैं कि वे अनियमितताओं की जांच करती हैं, और सब-कॉन्ट्रैक्टर पेमेंट के जिम्मेदार हैं। वहीं, लीफरैंडो का दावा है कि वे अपने राइडर्स को सीधे जॉब देते हैं, 14 यूरो प्रति घंटा सैलरी के साथ छुट्टियां और अन्य फायदे। लेकिन हकीकत में कई छात्रों की कहानी अलग है।
सपनों का टूटना और भविष्य की चिंता
भारत में अच्छी नौकरियां छोड़कर आए छात्र यहां शोषण के चक्र में फंस जाते हैं। उनकी योग्यता बेकार हो जाती है, और जर्मनी में अच्छा करियर बनाना दूर की कौड़ी लगता है। कई छात्र डिप्रेशन और घर लौटने की सोचते हैं, लेकिन कर्ज की वजह से मजबूर हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि छात्रों को आने से पहले अच्छी रिसर्च करनी चाहिए और एजेंट्स के झांसे में न आएं।
यह समस्या सिर्फ भारतीय छात्रों की नहीं, बल्कि कई विकासशील देशों के युवाओं की है। जर्मनी सरकार को भी इस पर ध्यान देने की जरूरत है, ताकि विदेशी छात्रों का शोषण रुके।