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प्रोफेसर अरुण कुमार ने हाल के जीएसटी संशोधनों और उनके आर्थिक प्रभावों पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जिसमें सरकार की नीतियों को असंगठित क्षेत्र के लिए हानिकारक और संगठित क्षेत्र के लिए लाभकारी बताया गया है। उन्होंने जीएसटी की जटिल संरचना और इसके कारण असंगठित क्षेत्र में बढ़ती बेरोजगारी पर चिंता जताई।
जीएसटी की जटिलता और मूल उद्देश्य से विचलन प्रोफेसर कुमार के अनुसार, जीएसटी को शुरू में चार स्लैब (5%, 12%, 18%, 28%) के साथ पेश किया गया था, जिसे अब तीन स्लैब (5%, 18%, 40%) के रूप में बताया जा रहा है। हालांकि, वास्तव में छह से सात स्लैब मौजूद हैं, जिसमें 0%, 1% (कंपोजीशन स्कीम), सिगरेट/ज्वेलरी पर विशेष दरें शामिल हैं। यह जटिलता जीएसटी के मूल उद्देश्य—’एक देश, एक कर’—के विपरीत है। उन्होंने पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के तर्क का उल्लेख किया कि हवाई चप्पल और मर्सिडीज पर एक ही कर नहीं लगाया जा सकता, जिसके कारण यह जटिल संरचना बनी।
असंगठित क्षेत्र पर भारी पड़ता जीएसटी जीएसटी का सबसे बड़ा प्रभाव असंगठित और संगठित क्षेत्रों पर पड़ा है। असंगठित क्षेत्र, जिसमें 50 लाख (सेवा) या 20/40 लाख (वस्तु) तक टर्नओवर वाली इकाइयाँ या कंपोजीशन स्कीम (1.5 करोड़ तक) शामिल हैं, को इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) नहीं मिलता। इससे उनकी लागत बढ़ती है, जबकि संगठित क्षेत्र ITC का लाभ उठाकर सस्ती वस्तुएँ बेचता है। परिणामस्वरूप, मांग असंगठित से संगठित क्षेत्र की ओर स्थानांतरित हो रही है। प्रेशर कुकर, चमड़ा, लगेज, एफएमसीजी और कपड़ा जैसे उद्योगों में छोटी इकाइयाँ संघर्ष कर रही हैं, जबकि बड़ी इकाइयाँ फल-फूल रही हैं। ई-कॉमर्स और मॉल्स की मांग बढ़ी है, लेकिन पड़ोस की छोटी दुकानों में गिरावट आई है।
नोटबंदी से लेकर महामारी तक: असंगठित क्षेत्र का पतन प्रोफेसर कुमार ने बताया कि नोटबंदी, जीएसटी, एनबीएफसी संकट और महामारी ने असंगठित क्षेत्र को कमजोर किया है, जहाँ देश की 94% कार्यशक्ति कार्यरत है। हाल की जीएसटी कटौतियाँ संगठित क्षेत्र को और सस्ता बनाएँगी, जिससे असंगठित क्षेत्र में बेरोजगारी और बढ़ेगी।
अमेरिकी शुल्कों का जवाब और जीएसटी कटौती हाल ही में जीएसटी दरों में कटौती का कारण अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा भारतीय निर्यात पर 50% अतिरिक्त शुल्क की घोषणा को बताया गया है, जिससे 4.4 लाख करोड़ रुपये के निर्यात पर असर पड़ सकता है। प्रोफेसर कुमार इसे जल्दबाजी में लिया गया “घुटने टेकने वाला” कदम मानते हैं, जो अपने उद्देश्य—निर्यात को प्रतिस्पर्धी बनाना—में विफल रहेगा। उनका कहना है कि असंगठित क्षेत्र की गिरावट से कुल मांग नहीं बढ़ेगी, जिसके बिना यह कटौती अप्रभावी रहेगी। इसे ‘सुधार’ नहीं, बल्कि ‘कर कटौती’ कहा जाना चाहिए।
आर्थिक प्रभाव और उपभोक्ता संदेह अमेरिकी शुल्कों से व्यापार घाटा बढ़ेगा, रुपया कमजोर होगा (वर्तमान में 88 से नीचे), और शेयर बाजार व विदेशी निवेश पर नकारात्मक असर पड़ेगा। जीएसटी कटौती से 48,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान होगा, जो अर्थव्यवस्था में 6-8 लाख करोड़ की गिरावट को कवर नहीं करेगा। उपभोक्ताओं तक कटौती का लाभ पहुँचने पर भी संदेह है, क्योंकि व्यवसाय इसे स्वयं रख सकते हैं। एंटी-प्रॉफिटियरिंग कमेटी के भंग होने से यह सुनिश्चित करना मुश्किल है कि लाभ उपभोक्ताओं तक पहुँचे। सीमेंट और बीमा जैसे क्षेत्रों में कीमतें कम होने की संभावना कम है।
सरकारी नीतियों पर सवाल प्रोफेसर कुमार ने सरकार की नीतियों को असंगठित क्षेत्र के खिलाफ बताया, जो पिछले 8-9 वर्षों से संगठित क्षेत्र पर केंद्रित हैं। असंगठित क्षेत्र को “संगठित” करने की कोशिश इसकी छोटी प्रकृति के कारण असफल रही है। ग्रामीण रोजगार योजनाओं में कटौती और बड़े बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर ध्यान ने असंगठित क्षेत्र को और कमजोर किया है। उनका सुझाव है कि मांग बढ़ाने और निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार को 90% गरीब और असंगठित क्षेत्र पर ध्यान देना चाहिए।
शक्ति का केंद्रीकरण और शासन की चुनौतियाँ प्रोफेसर ने शक्ति के केंद्रीकरण पर भी चिंता जताई। उन्होंने पूर्व केंद्रीय मंत्री जगदीश धनकर के इस्तीफे का उदाहरण देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) से सारे निर्णय लिए जा रहे हैं, और विशेषज्ञों की सलाह को नजरअंदाज किया जा रहा है। यह केंद्रीकरण देश के सुचारू संचालन के लिए हानिकारक है।
निष्कर्ष प्रोफेसर अरुण कुमार का विश्लेषण जीएसटी संशोधनों की कमियों को उजागर करता है, जो असंगठित क्षेत्र को नुकसान पहुँचाते हुए संगठित क्षेत्र को बढ़ावा दे रहे हैं। उन्होंने सरकार से असंगठित क्षेत्र और गरीबों पर ध्यान केंद्रित करने की अपील की, ताकि स्थायी और समावेशी विकास सुनिश्चित हो सके।