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3 नवंबर, 1988 को भारतीय सेना ने ऑपरेशन कैक्टस को अंजाम दिया, जो मालदीव में एक सैन्य तख्तापलट को विफल करने वाला एक साहसिक और त्वरित मिशन था। इस ऑपरेशन की विश्व भर में सराहना हुई, जिसका उद्देश्य तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल गयूम की सरकार को गिराने की साजिश को नाकाम करना था। इस साजिश के पीछे मालदीव के व्यापारी अब्दुल्ला लतीफी और श्रीलंका के चरमपंथी संगठन पीपुल्स लिबरेशन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ तमिल ईलम (PLOTE) का हाथ था।
मालदीव का सामरिक महत्व: हिंद महासागर में भारत के दक्षिण-पश्चिमी तट के पास स्थित मालदीव एक छोटा द्वीप राष्ट्र है, जिसे इसके उष्णकटिबंधीय द्वीपों और सफेद रेतीले समुद्र तटों के लिए “ट्रॉपिकल पैराडाइज” के रूप में जाना जाता है। लगभग 1,200 छोटे-छोटे द्वीपों का यह समूह, जिसमें से 200 कोरल द्वीप रहने योग्य हैं, भारत के समुद्री व्यापार मार्गों और क्षेत्रीय भू-राजनीति में महत्वपूर्ण है। मालदीव की औसत ऊंचाई समुद्र तल से मात्र 1.5 मीटर है, जो इसे जलवायु परिवर्तन के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बनाता है। इसकी रणनीतिक स्थिति इसे हिंद महासागर में चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए महत्वपूर्ण बनाती है। ऑपरेशन का नाम “कैक्टस” मालदीव के कोरल द्वीपों की कैक्टस जैसी संरचना के कारण रखा गया।
1988 का तख्तापलट प्रयास: मालदीव को 1965 में ब्रिटिश शासन से आजादी मिली और 1968 में राजशाही समाप्त कर लोकतंत्र अपनाया गया। पहले राष्ट्रपति इब्राहिम नासिर भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद सिंगापुर भाग गए। 1978 में अब्दुल गयूम राष्ट्रपति बने और 30 वर्षों तक शासन किया। उनके कार्यकाल में 1980, 1983 और 1988 में तख्तापलट के प्रयास हुए। 1988 का प्रयास सबसे गंभीर था, जिसे नासिर के इशारे पर लतीफी और PLOTE के 200 आतंकवादियों ने अंजाम दिया, जो पर्यटकों के भेष में स्पीड बोट्स से मालदीव पहुंचे।
भारत से मदद की गुहार: 3 नवंबर, 1988 की सुबह आतंकवादियों ने मालदीव की राजधानी माले में प्रमुख सरकारी इमारतों, हवाई अड्डे, बंदरगाहों और मीडिया स्टेशनों पर कब्जा कर लिया। राष्ट्रपति गयूम, जो भारत का दौरा करने वाले थे, को सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया। उनकी टीम ने पाकिस्तान, श्रीलंका, सिंगापुर, अमेरिका, ब्रिटेन और भारत से मदद मांगी। अन्य देशों ने सैन्य या समय की कमी के कारण मना कर दिया, जिसके बाद भारत एकमात्र विकल्प बचा।
भारत की त्वरित कार्रवाई: प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने तुरंत एक आपातकालीन बैठक बुलाई, जिसमें सेना प्रमुख और रॉ अधिकारी शामिल थे। मालदीव के नक्शे की कमी के बावजूद, टूरिस्ट मैप और कॉफी टेबल बुक से जानकारी जुटाई गई। पैराड्रॉपिंग का विचार हवा और छोटे द्वीपों के जोखिम के कारण रद्द कर दिया गया। हुलुल आइलैंड को ऑपरेशन का प्रवेश द्वार चुना गया, क्योंकि माले का हवाई अड्डा आतंकवादियों के कब्जे में था।
ऑपरेशन का क्रियान्वयन: ऑपरेशन कैक्टस 3 नवंबर, 1988 की रात शुरू हुआ। ब्रिगेडियर फारूक बलसारा के नेतृत्व में 50 इंडिपेंडेंट पैरा ब्रिगेड के कमांडो आगरा से रवाना हुए। मदद की गुहार के 9 घंटे के भीतर भारतीय सेना हुलुल आइलैंड पर उतरी। दो टीमें बनाई गईं: एक ने हवाई अड्डे को सुरक्षित किया, दूसरी ने स्थानीय नावों से माले पहुंचकर गयूम को बचाया और आतंकवादियों का मुकाबला किया। रात 2:10 बजे गयूम को सुरक्षित निकाला गया और सुबह 4:00 बजे तक स्थिति नियंत्रण में थी।
परिणाम और वैश्विक प्रभाव: भारतीय सेना ने आतंकवादियों को खदेड़ दिया, कुछ को पकड़कर मालदीव सुरक्षा बलों को सौंपा। भागने की कोशिश कर रहे आतंकवादियों को भारतीय नौसेना के जहाजों INS गोदावरी और INS बेतवा ने रोका। अंतिम टकराव में 19 आतंकवादी मारे गए, दो बंधकों की जान गई, और लतीफी पकड़ा गया। 18 घंटे में पूरा हुआ यह ऑपरेशन भारत का विदेशी धरती पर पहला सफल सैन्य अभियान था। अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन सहित विश्व ने भारत की सराहना की। इसने भारत-मालदीव संबंधों को मजबूत किया और क्षेत्रीय स्थिरता में भारत की भूमिका को रेखांकित किया। ऑपरेशन कैक्टस आज भी विश्व के सबसे सफल कमांडो ऑपरेशनों में गिना जाता है।