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लंदन: यूनाइटेड किंगडम (यूके) की राजधानी लंदन में हाल ही में एक विशाल एंटी-इमीग्रेशन विरोध प्रदर्शन देखने को मिला, जिसे “यूनाइट द किंगडम” नाम दिया गया। इस प्रदर्शन में अनुमानित तौर पर 1.5 लाख से अधिक लोग सेंट्रल लंदन की सड़कों पर उतरे, जिसे यूके के इतिहास में सबसे बड़े एंटी-इमीग्रेशन प्रदर्शनों में से एक माना जा रहा है। इसकी तीव्रता और भीड़ की संख्या ने पुलिस और सरकार को भी हैरान कर दिया।
प्रदर्शन की पृष्ठभूमि और कारण
पिछले दो दशकों में यूके में आप्रवासन, खासकर अफ्रीका और मध्य पूर्व से, तेजी से बढ़ा है। 2015 के शरणार्थी संकट के बाद से सीरिया, अफगानिस्तान, सूडान और इरिट्रिया जैसे देशों से बड़ी संख्या में शरणार्थी यूके पहुंचे हैं। इसके अलावा, कुशल श्रमिकों और छात्रों का आगमन भी बढ़ा है। ब्रेग्जिट के बाद भी आप्रवासन की दर में कमी नहीं आई, जो कई नागरिकों की उम्मीदों के विपरीत था।
प्रदर्शनकारी मानते हैं कि बढ़ता आप्रवासन उनकी नौकरियों, सुरक्षा और अधिकारों को खतरे में डाल रहा है। आर्थिक चुनौतियाँ जैसे जीवन-यापन की बढ़ती लागत, आवास की कमी, स्कूलों और सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव, और नौकरी की असुरक्षा ने इस आंदोलन को और हवा दी है। विशेष रूप से, इंग्लिश चैनल के रास्ते नावों से अवैध रूप से यूके में प्रवेश करने की घटनाएँ भी गुस्से का एक बड़ा कारण बनी हैं।
प्रमुख नेता और आंदोलन
इस प्रदर्शन में टॉमी रॉबिनसन, जो इंग्लिश डिफेंस लीग के पूर्व नेता हैं, एक प्रमुख चेहरा बनकर उभरे। उन्होंने आप्रवासन, इस्लाम और बहुसंस्कृतिवाद के खिलाफ लंबे समय से अभियान चलाया है। यह प्रदर्शन दक्षिणपंथी आंदोलन का हिस्सा माना जा रहा है, जिसे संयुक्त राज्य अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने से भी प्रोत्साहन मिला है।
विरोध और जवाबी प्रदर्शन
मार्च में प्रदर्शनकारियों ने यूनियन जैक, सेंट जॉर्ज क्रॉस, अमेरिकी और इजरायली झंडे लहराए और “सेंड देम होम” व “प्रोटेक्ट अवर बॉर्डर्स” जैसे नारे लगाए। दूसरी ओर, करीब 5000 वामपंथी कार्यकर्ताओं ने जवाबी प्रदर्शन किया, जिसमें उन्होंने दक्षिणपंथी प्रदर्शन को नस्लवादी और विदेशी-विरोधी करार दिया। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई झड़पें हुईं, जिसमें 26 पुलिसकर्मी घायल हुए और कई लोगों को गिरफ्तार किया गया।
सरकार का रुख
यूके के प्रधानमंत्री कियर स्टारर ने हिंसा की कड़ी निंदा की और कहा कि आप्रवासन नीतियाँ कानून के दायरे में बनेंगी, न कि सड़कों के दबाव में। सरकार ने सीमा नियंत्रण को और सख्त करने का वादा किया है, लेकिन साथ ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का समर्थन भी किया है। मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने इतनी बड़ी भीड़ को नियंत्रित करने में आई चुनौतियों को स्वीकार किया और भविष्य में बेहतर तैयारी का भरोसा दिलाया।
प्रदर्शन का प्रभाव
यह प्रदर्शन यूके की राजनीति और समाज पर गहरा असर डाल सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि यह लेबर सरकार पर कठोर आप्रवासन नीतियाँ अपनाने का दबाव बढ़ा सकता है। इसके अलावा, दक्षिणपंथी नेताओं को एक बड़ा मंच मिल सकता है, और संभवतः एक नई एंटी-इमीग्रेशन राजनीतिक पार्टी भी उभर सकती है।
हालांकि, इस प्रदर्शन से देशी समुदायों और प्रवासियों के बीच सामाजिक तनाव बढ़ने का खतरा है, जिससे नफरत भरे अपराधों और ध्रुवीकरण में वृद्धि हो सकती है। यह घटना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और पुलिसिंग को लेकर भी बहस छेड़ रही है, जो एक लोकतांत्रिक देश के लिए बड़ी चुनौती है।
विश्लेषकों का कहना है कि यह प्रदर्शन भले ही आप्रवासन के खिलाफ नजर आता हो, लेकिन इसके मूल में आर्थिक असुरक्षा, आवास संकट और सांस्कृतिक आशंकाएँ हैं, जो इस आंदोलन को और जटिल बनाती हैं।