भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) के बीच हाल ही में हुआ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) एक बड़ा कदम है। यह समझौता दोनों पक्षों के लिए नए रास्ते खोल सकता है, लेकिन कुछ चिंताएं भी हैं। आइए जानते हैं इसकी मुख्य बातें और असर आसान भाषा में।
इस समझौते से बीएमडब्ल्यू, ऑडी और मर्सिडीज बेंज जैसी महंगी कारें भारत में सस्ती हो सकती हैं। अभी इन पर 100% से 110% तक आयात शुल्क लगता है, जो घटकर पहले 30-40% और बाद में 10% तक आ सकता है। साथ ही, विदेशी शराब, चॉकलेट, मिठाई और प्रोसेस्ड फूड पर भी टैक्स कम हो सकता है, जैसे शराब पर 150% से घटकर 20-40%। इससे आम लोग इन चीजों को आसानी से खरीद सकेंगे।

भारतीय कंपनियों पर पड़ सकता है बुरा असर
लेकिन यह डील भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री के लिए खतरा भी है। यह सेक्टर 3-4 करोड़ लोगों को नौकरी देता है। विदेशी कारें सस्ती होने से महिंद्रा और टाटा जैसी देसी कंपनियों की बिक्री गिर सकती है, जिससे नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। आनंद महिंद्रा ने कहा है कि जल्दबाजी न करें, धीरे-धीरे आगे बढ़ें।
समझौते की कहानी और वजह
यह बातचीत 2007 में शुरू हुई थी, लेकिन 2013 में रुक गई क्योंकि भारत अपने ऑटो सेक्टर को खोलने के लिए तैयार नहीं था। कोविड महामारी के बाद सप्लाई चेन टूटने और अमेरिका की सख्त व्यापार नीतियों (जैसे भारतीय स्टील पर 50% टैरिफ) ने भारत और ईयू को फिर से करीब लाया।
भारत के कपड़े, गारमेंट्स, चमड़े और जूतों जैसे उत्पादों को ईयू में कम टैक्स पर बेचने का मौका मिलेगा, जैसा बांग्लादेश और वियतनाम को मिलता है। दवाओं और आईटी सेवाओं में भी भारतीय कंपनियां मजबूत होंगी, जैसे डेटा सुरक्षा में।

मैन्युफैक्चरिंग या सिर्फ बाजार?
चिंता यह है कि ईयू कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाने या निवेश करने की कोई शर्त नहीं है। अगर भारत सिर्फ आयात का केंद्र बन गया, तो ‘मेक इन इंडिया’ का लक्ष्य प्रभावित हो सकता है। हालांकि, इलेक्ट्रिक वाहनों पर अभी टैक्स जारी रहेगा।

अंत में, यह समझौता तभी सफल होगा जब इसका इस्तेमाल तकनीक हस्तांतरण और निवेश बढ़ाने के लिए किया जाए। ग्राहकों के लिए अच्छी खबर है, लेकिन घरेलू फैक्टरियों और नौकरियों की रक्षा जरूरी है।