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अर्थशास्त्री प्रोफेसर अरुण कुमार ने भारत की अर्थव्यवस्था और समाज की गंभीर समस्याओं पर चिंता जताई है। उन्होंने शिक्षा, बेरोजगारी, काले धन और गलत नीतियों को देश की प्रगति में सबसे बड़ी बाधाएँ बताया है। आइए, उनकी बातों को आसान भाषा में समझते हैं।
शिक्षा व्यवस्था की खामियाँ
प्रोफेसर कुमार के अनुसार, भारत की शिक्षा व्यवस्था केवल अमीरों के लिए बनाई गई है, गरीबों को इसमें मौका नहीं मिलता। 2024 की एक रिपोर्ट बताती है कि 14 से 18 साल के 40% बच्चे दूसरी कक्षा के स्तर की पढ़ाई और गणित भी नहीं कर पाते। भारतीय विश्वविद्यालय सिविल सेवकों को तैयार करने में लगे हैं, न कि विचारकों को। इससे रटने की आदत बढ़ी है और असली ज्ञान की कमी रही है।
भारत अनुसंधान और विकास (R&D) पर अपनी जीडीपी का सिर्फ 0.65% खर्च करता है, जबकि चीन 3% खर्च करता है। इस कारण भारत तकनीक में पिछड़ गया है और कई बार चीनी इंजीनियरों को बुलाना पड़ता है। अच्छी शिक्षा न मिलने और खराब नीतियों के चलते प्रतिभाशाली भारतीय विदेश चले जाते हैं। 1960 में कोठारी आयोग ने शिक्षा पर 6% जीडीपी खर्च करने की सलाह दी थी, लेकिन भारत कभी 4% से ज्यादा नहीं खर्च कर पाया। नतीजा, 95% बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं मिलती।
बढ़ती बेरोजगारी और सामाजिक संकट
देश में 15 से 29 साल के पढ़े-लिखे युवाओं में बेरोजगारी सबसे ज्यादा है। हालात इतने खराब हैं कि एमबीए और पीएचडी डिग्री वाले लोग नाली साफ करने या चपरासी की नौकरी के लिए आवेदन कर रहे हैं। नौकरी न मिलने से युवा निराश हैं और कई ड्रग्स या शराब की ओर बढ़ रहे हैं। कुछ राजनीतिक दल इन युवाओं का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करते हैं। ऑटोमेशन के कारण संगठित क्षेत्र में नौकरियाँ नहीं बढ़ रही हैं, और लोग छोटे-मोटे कामों के लिए असंगठित क्षेत्र में जा रहे हैं।
काले धन का जाल
प्रोफेसर कुमार कहते हैं कि काला धन भारत की सबसे बड़ी समस्या है, जो विकास दर को 5% तक कम करता है। अगर काला धन न होता, तो आज भारत की अर्थव्यवस्था 3.5 ट्रिलियन की जगह 26-27 ट्रिलियन डॉलर की होती, और हर व्यक्ति 8 गुना अमीर होता। काला धन भ्रष्टाचार को बढ़ाता है और शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कों जैसी सेवाओं को कमजोर करता है। 2016 की नोटबंदी से काले धन पर कोई असर नहीं पड़ा, उल्टे असंगठित क्षेत्र को 100 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। जीएसटी ने भी छोटे व्यवसायों को नुकसान पहुँचाया, क्योंकि उन्हें टैक्स छूट नहीं मिलती। भ्रष्ट नेता, व्यापारी और अधिकारी मिलकर काले धन की अर्थव्यवस्था चलाते हैं।
गलत विकास मॉडल
आजादी के बाद भारत ने यूरोप का “ट्रिकल-डाउन” मॉडल अपनाया, जो यहाँ की परिस्थितियों के लिए सही नहीं था। ब्रिटिश शासन ने भारत के उद्योगों को नष्ट किया, और 1991 के बाद विश्व बैंक और आईएमएफ के दबाव में निजीकरण को बढ़ावा मिला। नीतियाँ अमीरों के पक्ष में बनीं, जिससे गाँव और शहरों के बीच असमानता बढ़ी। प्रोफेसर कुमार का कहना है कि नीति-निर्माता गरीबों को अच्छी शिक्षा नहीं देना चाहते। क्रोनी कैपिटलिज्म और कॉर्पोरेट प्रभाव ने छोटे व्यवसायों को नुकसान पहुँचाया। 2014 से 2022 के बीच 2.5 लाख अमीर लोग देश छोड़कर चले गए। बैंकों के एनपीए (खराब कर्ज) भी भ्रष्टाचार और गलत नीतियों का नतीजा हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का खतरा
प्रोफेसर कुमार चेतावनी देते हैं कि अगले 2-3 साल में AI के कारण भारी बेरोजगारी बढ़ेगी। यह न केवल मजदूरी, बल्कि डॉक्टर, वकील, शिक्षक जैसे मानसिक कार्यों को भी प्रभावित करेगा। बेरोजगारी 6-7% से बढ़कर 50-60% तक हो सकती है।
उपभोक्तावाद और सामाजिक बदलाव
1990 के बाद बाजारीकरण ने “ज्यादा बेहतर है” की सोच को बढ़ावा दिया, जिससे लोग दिखावे में फंस गए। समाज में त्याग और सामूहिकता कम हुई, जिससे सामाजिक बदलाव मुश्किल हो गया।
कर व्यवस्था की असमानता
भारत में हर व्यक्ति अप्रत्यक्ष कर देता है, चाहे वह गरीब हो या अमीर, लेकिन प्रत्यक्ष कर सिर्फ 1.1% लोग देते हैं। भारत का टैक्स-जीडीपी अनुपात 17.5% है, जो विकसित देशों (22-30%) से कम है। काले धन पर नियंत्रण से टैक्स संग्रह 24% तक बढ़ सकता है।
निष्कर्ष
प्रोफेसर अरुण कुमार का मानना है कि अगर भारत को प्रगति करनी है, तो शिक्षा, बेरोजगारी और काले धन की समस्या को तुरंत हल करना होगा। नीतियों को गरीबों और असंगठित क्षेत्र के लिए बनाना जरूरी है, वरना देश और पिछड़ जाए
सौजन्य:- kitnu parantu with sheeba YouTube