भारत के किसान इन दिनों सड़कों पर हैं। वे अमेरिका के साथ होने वाले नए व्यापार समझौते का विरोध कर रहे हैं। लेकिन क्या यह सिर्फ अमेरिकी सामान की वजह से है? नहीं, असली समस्या हमारे देश की कृषि व्यवस्था में गहरी जड़ें जमाए बैठी है। विशेषज्ञ कहते हैं कि हमें पुराने कानूनों को छोड़कर नए ‘फार्म लॉज 2.0’ की जरूरत है। आइए जानते हैं पूरी कहानी सरल शब्दों में।

अमेरिका-भारत व्यापार समझौता: विरोध की असली वजह क्या है?
किसान संगठन इस समझौते को ‘अमेरिका के सामने सरेंडर’ बता रहे हैं। यह समझौता 7 फरवरी 2026 को घोषित होने वाला है। किसानों को डर है कि अमेरिका के सस्ते और सब्सिडी वाले फल-सब्जियां जैसे सेब, बादाम और सोयाबीन हमारे बाजार में भर जाएंगे। इससे भारतीय किसानों की कमाई पर बुरा असर पड़ेगा। 2025 में जनवरी से नवंबर तक अमेरिका से कृषि सामान का आयात 34% बढ़कर 2.9 अरब डॉलर हो गया है। इससे पहले भी ऐसे आयात बढ़ते जा रहे हैं, जिससे लोकल किसानों की फसलें नहीं बिक पातीं।
किसान यूनियन के एक नेता ने कहा, “यह समझौता हमारे किसानों को बर्बाद कर देगा। अमेरिका में किसान बड़े स्तर पर खेती करते हैं, जबकि हमारे यहां छोटे किसान संघर्ष कर रहे हैं।”

भारतीय कृषि की बड़ी समस्याएं: उत्पादकता और बेरोजगारी
असल में समस्या व्यापार समझौते से ज्यादा हमारी अपनी कृषि व्यवस्था की कमजोरियां हैं। अमेरिका में सिर्फ 1.3% लोग खेती करते हैं और वे 190 अरब डॉलर का निर्यात करते हैं। लेकिन भारत में 42-46% लोग कृषि पर निर्भर हैं, फिर भी निर्यात सिर्फ 50-55 अरब डॉलर का है।
यहां लाखों लोग खेती में लगे हैं, लेकिन वे ज्यादा उत्पादन नहीं कर पाते। इसे ‘प्रच्छन्न बेरोजगारी’ कहते हैं – मतलब लोग काम तो कर रहे हैं, लेकिन कमाई नहीं हो रही। एक औसत किसान परिवार की महीने की कमाई सिर्फ 10,000 से 12,000 रुपये है, और वो भी ज्यादातर मजदूरी या सरकारी मदद से।
इसके अलावा, हमारे यहां जमीन के टुकड़े छोटे हैं – औसतन 1 हेक्टेयर। जबकि अमेरिका में 180 हेक्टेयर। छोटे किसान मशीनें या नई तकनीक नहीं खरीद पाते। हाल के सर्वे में पता चला है कि जलवायु परिवर्तन से भी फसलें प्रभावित हो रही हैं, जैसे सूखा या बाढ़, जो छोटे किसानों को और मुश्किल में डाल देता है।

मंडी सिस्टम की असफलता: बिचौलिए कैसे लूटते हैं?
एपीएमसी मंडियां किसानों को बचाने के लिए बनी थीं, लेकिन अब ये समस्या बन गई हैं। देश को 42,000 मंडियों की जरूरत है, लेकिन सिर्फ 7,000 काम कर रही हैं। मंडियों में बिचौलिए (आढ़तिए) का राज है। अगर ग्राहक 100 रुपये देता है, तो किसान को सिर्फ 25-40 रुपये मिलते हैं। बाकी पैसा बिचौलिए रख लेते हैं।
एक किसान ने बताया, “मंडी में जाना पड़ता है, लेकिन वहां सही दाम नहीं मिलता। ट्रांसपोर्ट और कमीशन से कमाई खत्म हो जाती है।”

फार्म लॉज 2.0: नए कानून क्यों जरूरी?
2020 के कृषि कानून वापस ले लिए गए, लेकिन समस्या जस की तस है। विशेषज्ञ कहते हैं कि हमें ‘फार्म लॉज 2.0’ चाहिए – एक स्मार्ट वर्जन। इसमें तीन मुख्य चीजें:
- बिचौलियों का एकाधिकार तोड़ना, लेकिन किसानों के लिए सुरक्षा भी रखना। सरकारी और प्राइवेट दोनों बाजार हों।
- अनुबंध खेती को मजबूत बनाना, ताकि कंपनियां किसानों को धोखा न दें। फास्ट ट्रैक कोर्ट से झगड़े जल्दी सुलझें।
- निर्यात पर बार-बार रोक न लगे, ताकि किसानों को स्थिर नीतियां मिलें।
2020 के विरोध की तरह ही, अब भी किसान ट्रैक्टरों पर सड़कें जाम कर रहे हैं। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सुधार बिना दर्द के नहीं होंगे।
सब्सिडी से हमेशा खुशहाली नहीं आ सकती। भारत के सामने दो रास्ते हैं: पुरानी व्यवस्था में फंसे रहना या सुधारों से आगे बढ़ना। विशेषज्ञ कहते हैं कि देर करने से नुकसान बढ़ेगा। कृषि को एक ‘क्रांति’ की जरूरत है, ताकि किसान समृद्ध हों और देश का विकास हो। सरकार को किसानों की बात सुननी होगी और नए कानून लाने होंगे।