आजकल भारत की अर्थव्यवस्था की बात हर तरफ हो रही है। एक तरफ हम दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं, लेकिन दूसरी तरफ लोग पूछ रहे हैं – “ये ग्रोथ आम आदमी तक क्यों नहीं पहुँच रही?” हाल ही में एक वीडियो में विशेषज्ञों ने इस मुद्दे पर गहराई से चर्चा की। हमने उसे आसान भाषा में आपके लिए तैयार किया है। चलिए, विस्तार से समझते हैं।

1. आर्थिक वृद्धि (Growth) vs असली विकास (Development)
भारत फिलहाल 7% से ज़्यादा की रफ्तार से बढ़ रहा है। ये दुनिया में सबसे तेज़ है! लेकिन ‘विकसित भारत 2047’ का सपना सिर्फ जीडीपी के नंबर बढ़ाने से नहीं पूरा होगा।
ग्रोथ का मतलब है कुल पैसा बढ़ना। डेवलपमेंट का मतलब है – हर व्यक्ति का जीवन बेहतर होना, सबको बराबर मौका मिलना।
अभी ये चुनौती बनी हुई है। अमीर और गरीब के बीच का फासला बढ़ रहा है।
2. उपभोग का ‘K-शेप्ड’ पैटर्न: अमीर खा रहे, गरीब देख रहे
भारत की जीडीपी में 60% हिस्सा निजी उपभोग (लोगों का खर्च) का है। ये अच्छी बात है, क्योंकि इससे अर्थव्यवस्था चलती है। लेकिन यहाँ एक नया ‘K-शेप्ड’ पैटर्न दिख रहा है।
क्या है ये?
- टॉप 10% अमीर लोग ज़्यादातर खर्च कर रहे हैं।
- नीचे के 50% गरीब लोगों की आय घट रही है।
कंपनियाँ सोशल मीडिया पर ध्यान खींचकर अनावश्यक सामान बेच रही हैं। इसे ‘अटेंशन इकॉनमी’ कहते हैं। लोग जरूरत से ज़्यादा खरीद रहे हैं, लेकिन असली खुशी नहीं आ रही।
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3. मैन्युफैक्चरिंग में अटका पहिया
पिछले 10-15 साल में मैन्युफैक्चरिंग (फैक्ट्री उत्पादन) का जीडीपी में हिस्सा 17-18% पर ही अटका हुआ है। कोई बढ़ोतरी नहीं।
समस्या क्या है?
- हम ‘लो वैल्यू’ चीजें बना रहे हैं। जैसे स्मार्टफोन असेंबल तो हो रहा है, लेकिन महंगे पार्ट्स (डिस्प्ले, चिप्स) बाहर से आते हैं।
- नतीजा? असली वैल्यू ऐडिशन कम।
हमारा ट्रेड डेफिसिट (आयात-निर्यात का अंतर) बढ़ रहा है। दुनिया के माल निर्यात में भारत का हिस्सा सिर्फ 1.6% है।

4. पैसा बैंकिंग में घूम रहा, फैक्ट्री में नहीं
एक बड़ी चिंता ये है कि बैंकिंग और फाइनेंस का हिस्सा 20 साल पहले 6% था, अब 27% हो गया।
पैसा रियल इकॉनमी (फैक्ट्री, सेवाएँ) में नहीं, बल्कि शेयर बाजार और सट्टेबाजी में घूम रहा है। ये लंबे समय के लिए अच्छा नहीं।

5. FDI: निवेश आ रहा, लेकिन सही जगह नहीं
भारत FDI कॉन्फिडेंस इंडेक्स में 18वें से 24वें नंबर पर गिर गया। कारण? जटिल नियम, टैक्स की उलझन और भूमि अधिग्रहण में देरी।
ज़्यादातर FDI सॉफ्टवेयर और सेवाओं में आ रहा है। असली मैन्युफैक्चरिंग (ऑटो, मशीनरी) में बहुत कम।
6. युवा आबादी: संपत्ति या बोझ?
2031 तक भारत की काम करने वाली आबादी 65% हो जाएगी। ये हमारा ‘डेमोग्राफिक डिविडेंड’ है।
लेकिन…
- अगर शिक्षा और स्किल अच्छी न हुई, तो ये बोझ बन सकता है।
- असली मजदूरी (रियल वेज) बढ़ नहीं रही। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था (बिना सरकारी जॉब) अभी भी बहुत बड़ी है।

दोस्तों, विकसित भारत बनने के लिए हमें सिर्फ ‘उपभोग बाजार’ नहीं रहना है। हमें मजबूत ‘प्रोडक्शन बेस’ बनाना होगा।
क्या करना चाहिए?
- हाई वैल्यू मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस।
- असली निवेश बढ़ाना।
- हर व्यक्ति की प्रोडक्टिविटी बढ़ाना
