भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति को बेहतर करने के लिए एक नई रणनीति पर काम कर रहा है। इस रणनीति में ग्लोबल साउथ के देशों के साथ साझेदारी और हरित ऊर्जा पर जोर देना शामिल है। आइए, इस नई दिशा को सरल भाषा में समझें।
ग्लोबल साउथ पर क्यों फोकस?
भारत अब पारंपरिक ऊर्जा आपूर्तिकर्ताओं (जैसे मध्य पूर्व या चीन) पर निर्भरता कम कर रहा है। इसके बजाय, वह अंगोला, ब्राजील, श्रीलंका और मोजाम्बिक जैसे ग्लोबल साउथ के देशों के साथ साझेदारी बढ़ा रहा है। ये देश तुलनात्मक रूप से कम विकसित हैं, लेकिन इनके पास प्राकृतिक संसाधन, जैसे लिथियम और कोबाल्ट, प्रचुर मात्रा में हैं। भारत इन संसाधनों का उपयोग इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए करना चाहता है।
भारत की रणनीति के मुख्य बिंदु
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आपूर्ति में विविधता: भारत नहीं चाहता कि कोई एक देश उसकी ऊर्जा आपूर्ति को नियंत्रित करे। इससे भू-राजनीतिक दबाव और आपूर्ति में रुकावट का जोखिम कम होगा।
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हरित ऊर्जा पर जोर: भारत 2070 तक शुद्ध शून्य (नेट जीरो) लक्ष्य हासिल करना चाहता है। इसके लिए लिथियम, कोबाल्ट और निकल जैसे खनिजों की जरूरत है, जो ईवी और सौर ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण हैं।
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वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में हिस्सेदारी: भारत केवल कच्चा माल खरीदने के बजाय खनन, शोधन और विनिर्माण में हिस्सा लेना चाहता है। इससे वह वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति बनाएगा।
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ग्लोबल साउथ में नेतृत्व: भारत छोटे देशों के साथ साझेदारी करके ग्लोबल साउथ का नेता बनना चाहता है। यह कूटनीति सद्भावना पर आधारित है, न कि बड़े देशों की प्रतिस्पर्धा पर।
भारत को इसकी जरूरत क्यों?
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आयात पर निर्भरता कम करना: भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का 85% से अधिक आयात करता है। नई रणनीति से यह निर्भरता कम होगी।
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भू-राजनीतिक सुरक्षा: भारत नहीं चाहता कि कोई देश उसकी ऊर्जा आपूर्ति को हथियार के रूप में इस्तेमाल करे।
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हरित भविष्य: स्वच्छ ऊर्जा और ईवी को बढ़ावा देने के लिए भारत को खनिजों की जरूरत है।
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वैश्विक छवि: ग्लोबल साउथ के साथ साझेदारी से भारत की वैश्विक मंचों, जैसे जी20 और ब्रिक्स, में सौदेबाजी की ताकत बढ़ेगी।
चुनौतियाँ क्या हैं?
इस रणनीति में कई चुनौतियाँ भी हैं:
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राजनीतिक अस्थिरता: जिन देशों के साथ भारत सौदे कर रहा है, वहाँ राजनीतिक और नियामक जोखिम हैं। उदाहरण के लिए, बोलिविया में लिथियम के राष्ट्रीयकरण की चर्चा चल रही है।
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बुनियादी ढांचे की कमी: ग्लोबल साउथ के कई देशों में सड़क, रेलवे या बिजली जैसे बुनियादी ढांचे की कमी है। भारत को इनमें निवेश करना होगा।
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उच्च लागत: इन परियोजनाओं में भारी निवेश की जरूरत है, जो भारत की वित्तीय स्थिति के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
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पर्यावरण और नैतिकता: कोबाल्ट खदानों में बाल श्रम और पर्यावरणीय नुकसान जैसे मुद्दों पर वैश्विक नियमों का पालन करना होगा।
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प्रतिस्पर्धा: चीन पहले से ही लैटिन अमेरिका और अफ्रीका में मजबूत स्थिति रखता है, जिससे भारत को कड़ी टक्कर मिलेगी।
भविष्य की राह
भारत की यह रणनीति न केवल उसकी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगी, बल्कि उसे वैश्विक मंच पर एक मजबूत और जिम्मेदार नेता के रूप में स्थापित करेगी। दीर्घकालिक अनुबंध और बहुपक्षीय साझेदारियाँ जोखिमों को कम करने में मदद करेंगी। यह भारत के विश्व गुरु बनने के सपने की दिशा में एक बड़ा कदम है।