इंदौर, जो लगातार आठ साल से भारत का सबसे स्वच्छ शहर चुना जाता रहा है, वहां जनवरी 2026 की शुरुआत एक बड़े स्वास्थ्य संकट के साथ हुई। भागीरथपुरा इलाके में दूषित नल के पानी से डायरिया और उल्टी का प्रकोप फैल गया। अब तक कम से कम 9 लोगों की जान जा चुकी है, 200 से ज्यादा लोग अस्पताल में भर्ती हैं और कुल 1,400 से अधिक लोग इस बीमारी की चपेट में आए हैं।

क्या हुआ? गंदा पानी कैसे पहुंचा घरों तक?
जांच में पता चला कि शहर की मुख्य पानी की पाइपलाइन एक पुलिस चौकी के पास बने शौचालय के ठीक नीचे से गुजर रही थी। पुरानी और टूटी-फूटी पाइपलाइन में दरार पड़ गई, जिससे शौचालय का गंदा पानी (सीवेज) सीधे पीने के पानी में मिल गया। पानी से बदबू आने लगी, स्वाद कड़वा हो गया और रंग भी बदल गया। लोग इसी पानी को पीते रहे, जिससे बीमारी तेजी से फैल गई।

शिकायतों के बावजूद हुई लापरवाही
स्थानीय लोगों ने दिसंबर 2025 से ही पानी की गंदगी की शिकायत की थी, लेकिन नगर निगम ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। यह संकट टाला जा सकता था, लेकिन रखरखाव की कमी और लापरवाही ने स्थिति को और खराब कर दिया।
यह सिर्फ इंजीनियरिंग की नहीं, शासन की भी विफलता
इंदौर को स्वच्छ सर्वेक्षण में हमेशा टॉप रैंक मिलती है, लेकिन यह रैंकिंग ज्यादातर सड़कों की सफाई और कचरा प्रबंधन पर आधारित होती है। पानी की पाइपलाइनों की जांच और गुणवत्ता जैसे अहम मुद्दों पर ध्यान कम दिया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि देश में स्वतंत्र जल नियामक (independent water regulator) और पानी की गुणवत्ता दिखाने वाला सार्वजनिक डैशबोर्ड नहीं है, जिससे ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं।

मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत हर व्यक्ति को स्वच्छ और सुरक्षित पीने का पानी मिलना मौलिक अधिकार है। इस संकट को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी किया है।
आगे क्या किया जाए?
- पाइपलाइनों का नियमित निरीक्षण और मरम्मत जरूरी
- पानी की गुणवत्ता की जांच हर महीने सार्वजनिक की जाए
- लोगों को तुरंत शिकायत करने का आसान तरीका हो
- स्वच्छता के साथ-साथ पानी की सुरक्षा पर भी जोर दिया जाए
यह घटना हमें याद दिलाती है कि साफ-सफाई की तस्वीर जितनी चमकदार दिखती है, उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। इंदौर जैसे शहर को अब सिर्फ रैंकिंग नहीं, बल्कि असली स्वास्थ्य सुरक्षा चाहिए।