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लद्दाख, जो कभी देश के सबसे शांतिपूर्ण इलाकों में शुमार था, आज हिंसा और अशांति की चपेट में है। प्रसिद्ध पर्यावरणविद् और आविष्कारक सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी ने इस विवाद को नई ऊंचाई दी है। वांगचुक पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए हैं और उन्हें चीन का एजेंट कहा जा रहा है। सरकार का दावा है कि उनके भड़काऊ भाषणों ने हिंसा को भड़काया, जबकि वांगचुक इसे मुद्दों से ध्यान भटकाने की साजिश बता रहे हैं। इस रिपोर्ट में हम लद्दाख की मांगों, हिंसा की क्रोनोलॉजी, वांगचुक के योगदान और सरकार के रुख पर विस्तार से नजर डालते हैं।लेह में अशांति क्यों???
सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी: आरोप और प्रतिक्रिया
सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनकी गिरफ्तारी उस समय हुई जब वे दोपहर 2:30 बजे प्रेस को संबोधित करने वाले थे और अपने गांव से लेह की ओर आ रहे थे। वांगचुक पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए हैं और उन्हें चीन का एजेंट कहा गया है, जिसकी वजह से उनकी गिरफ्तारी तभी से तय लग रही थी। गृह मंत्रालय के प्रेस नोट में सोनम वांगचुक के भड़काऊ भाषणों को हिंसा का कारण बताया गया है। उन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने स्थिति नियंत्रित करने का कोई गंभीर प्रयास किए बिना एंबुलेंस से अपने गांव चले गए, जिससे उनकी भूमिका संदिग्ध हो गई।
सोशल मीडिया पर सोनम वांगचुक के खिलाफ एंटीनेशनल होने, विदेशों से फंडिंग लेने और हिंसा भड़काने के आरोप लगाए जा रहे थे। उनके एनजीओ (SECMOL) का एफसीआरए लाइसेंस भी रद्द किया गया है। वांगचुक का कहना है कि सरकार मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाना चाहती थी। वांगचुक बार-बार कहते रहे हैं कि वे इतने सालों से शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन कर रहे थे, लेकिन उसे सफल नहीं होने दिया गया। उनका मानना है कि अगर शांति का आंदोलन सफल हो गया होता, तो युवाओं को हिंसा करने का मौका नहीं मिलता। 24 सितंबर से पहले और उसके बाद भी, वांगचुक ने बार-बार हिंसा की निंदा की और युवाओं से शांति के रास्ते पर चलने की अपील की।
होम मिनिस्ट्री अब कह रही है कि इस सारे वायलेंस के पीछे सोनम वांगचुक थे, जिन्हें अब विलेन या आतंकवादी घोषित किया जा रहा है। हालांकि, वांगचुक खुद गांधीवादी विचारों वाले हैं। उन्होंने हिंसा के बाद ट्वीट करके युवा पीढ़ी से हिंसा का सहारा न लेने की अपील की और कहा कि उनका रास्ता शांतिपूर्ण है। सरकार ने इस पूरे घटनाक्रम के लिए सोनम वांगचुक को ही जिम्मेदार ठहराया और कहा कि वह यूथ को मिसगाइड कर रहे थे। हिंसा होने के बाद वांगचुक ने अपना मूवमेंट वापस ले लिया। सरकार को एक बलि का बकरा चाहिए था ताकि वह यह कह सके कि यह सब किसी साजिश का नतीजा है और उनकी वजह से नहीं हुआ।
वांगचुक का काम और योगदान: एक आविष्कारक की कहानी
सोनम वांगचुक एक आविष्कारक रहे हैं। उन्होंने भारतीय सेना के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाला एक टेंट बनाया है, जिससे लाखों रुपए की बचत होती है और पर्यावरण की रक्षा होती है। उन्होंने आइस स्तूप बनाकर पानी के संकट का बड़ा समाधान खोजा, जिसके तहत बर्फ के रूप में पानी जमा करने की टेक्नोलॉजी बनाई जाती है जो गर्मियों में किसानों के पास पिघलकर जाता है। उनकी कहानी पर “थ्री इडियट्स” फिल्म बन चुकी है और उन्हें कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिले हैं।
लेह में हिंसा और आंदोलन का संदर्भ
सोनम वांगचुक और उनके साथियों ने लद्दाख में छठी अनुसूची लागू करने और पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने को लेकर 10 सितंबर से भूख हड़ताल की थी, जिसे 24 सितंबर की हिंसा के बाद समाप्त कर दिया गया। 24 सितंबर को अचानक बड़ी संख्या में लोग आ गए और उनका आक्रोश नियंत्रण से बाहर चला गया। इस हिंसा में बीजेपी के दफ्तर को जला दिया गया। गृह मंत्रालय के बयान के अनुसार, पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी, जिसमें कुछ लोगों की मौत हुई है (चार युवाओं की मौत की खबर है)। हिंसा में 30 से अधिक सुरक्षाकर्मी घायल हुए और 40 से अधिक लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए।
हिंसा के बाद लेह में इंटरनेट सेवा बंद कर दी गई, मोबाइल नेटवर्क ठप है, और ब्रॉडबैंड की रफ्तार धीमी कर दी गई है। लेह एपेक्स बॉडी (LAB) से जुड़े युवा नेताओं को भी हिरासत में लिया गया है। लद्दाख, जो कि देश के सबसे शांतिपूर्ण प्रांतों में से एक माना जाता है, आज आगजनी और गैरकानूनी गतिविधियों का सामना कर रहा है, क्योंकि वहाँ के लोग केंद्र सरकार से बहुत नाखुश हैं। छह साल से चल रहे इस शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन ने 24 सितंबर को हिंसक रूप ले लिया। छह साल तक विरोध और अनशन चलता रहा। 10 सितंबर से सोनम वांगचुक फिर से अनशन पर बैठते हैं। 21 सितंबर के आसपास होम मिनिस्ट्री बातचीत के लिए तैयार हुई, लेकिन सरकार का बातचीत का रवैया और शर्तें लोगों को नाखुश कर गईं। 23 सितंबर को अनशन एक ऐसे मोड़ पर आ गया जहाँ दो लोगों को हॉस्पिटलाइजेशन की जरूरत पड़ी। इससे प्रदर्शनकारियों का धैर्य टूट गया, और 24 तारीख को हिंसा हुई। नए भारत में अगर आप प्रोटेस्ट करेंगे और गलती से वायलेंस हो जाता है, तो उसका जवाब सीधे गोली और मौत से मिलेगा, और लद्दाख में कश्मीर जैसा क्रैकडाउन होगा।
यह विडंबना है कि लद्दाख के लोगों ने आर्टिकल 370 हटाए जाने का जश्न मनाया था, लेकिन अब उन्हें समझ आ रहा है कि उन्हें भी कश्मीरियों की तरह ट्रीट किया जा रहा है और वे अलगाव का मतलब समझ रहे हैं। लद्दाख बुद्धिस्ट एसोसिएशन के चेरिंग दर्ज ने कहा कि कभी भी नियमित बातचीत नहीं होती, और बातचीत शुरू हो, इसलिए सोनम को भूख हड़ताल और पदयात्रा करनी पड़ी।
विदेशी फंडिंग और राजनीतिक आरोप
गृह मंत्रालय ने सोनम वांगचुक के एनजीओ, एससीसीएमएल, का एफसीआरए लाइसेंस रद्द करते हुए कहा है कि उन्हें स्टॉकहोम से ₹4,93,25 का चंदा मिला है। यह आरोप लगाया गया है कि विदेशी चंदे का प्रयोग देश की संप्रभुता पर अध्ययन करने के लिए किया गया, जो एफसीआरए कानून का उल्लंघन है। सोनम वांगचुक की संस्था ने रिपोर्ट में कहा था कि पैसा खाद्य सुरक्षा और खाद्य संप्रभुता को लेकर जागरूकता फैलाने के लिए लिया गया है।
आईटी सेल द्वारा अभियान चलाया गया है जिसमें कांग्रेस पार्षद सेपक और राहुल गांधी को लद्दाख हिंसा से जोड़ा गया। संबित पात्रा और अमित मालवीय ने कथित तौर पर गलत तस्वीर वायरल की। ऑल्ट न्यूज़ के मोहम्मद जुबैर ने दावा किया है कि वायरल की गई तस्वीर सेपक की नहीं है। विदेशी फंडिंग का भूत खड़ा किया जा रहा है। निशिकांत दुबे ने तो सीधे कांग्रेस पार्षद सेपक और राहुल गांधी को जॉर्ज सोरोस से जोड़ दिया है। वांगचुक और बांग्लादेश के अंतरिम प्रधानमंत्री की पुरानी तस्वीरों को वायरल करके दावा किया जा रहा है कि वांगचुक चीन के एजेंट हैं। सोनम वांगचुक स्वयं कई बार चीन के कब्जे के खिलाफ बोल चुके हैं।
पिछले 24 घंटों में यह प्रोपेगेंडा चलाया गया है कि सोनम वांगचुक एक आतंकवादी हैं, चाइनीस एजेंट हैं, या यह सब चाइना ने करवाया है क्योंकि वहाँ रेयर अर्थ मिनरल्स मिले हैं। हालांकि, ये स्रोत बताते हैं कि रेयर अर्थ मिनरल्स का निष्कर्षण व्यवहार्य नहीं है, और यह मामला विदेशी हस्तक्षेप का नहीं, बल्कि हमारी घरेलू राजनीति और घरेलू मांगों का है। जो लोग आवाज उठा रहे हैं, उन्हें गद्दार या आतंकवादी बताकर अलग-थलग किया जा रहा है। इस नैरेटिव को “मूर्ख जिहाद” कहा गया है, जहाँ कोई भी आवाज़ उठाने वाला व्यक्ति, चाहे वह पंजाब के किसान हों, कश्मीर में आवाज़ उठाने वाला हो, या लद्दाखी, उसे पाकिस्तानी, ख़ालिस्तानी, बांग्लादेशी या सीआईए एसेट करार दिया जाता है। सरकार अपनी विफलता को छिपाने के लिए एक मेगा प्रोपेगेंडा मशीनरी चला रही है।
लद्दाख की मांगें और सरकार का रुख
2019 में लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाए जाने का लद्दाख के लोगों ने स्वागत किया था, जिसमें सोनम वांगचुक भी शामिल थे, लेकिन बाद में उनकी उम्मीदें टूट गईं। स्थानीय नेताओं का कहना है कि बीजेपी ने 2019 और 2020 के घोषणापत्र में छठी अनुसूची में शामिल करने का वादा किया था, लेकिन 2024 के घोषणापत्र में यह वादा नहीं किया गया। वांगचुक ने प्रधानमंत्री मोदी से अपील की है कि वे अमित शाह जी को समझाएं कि वचन पूरा करें, क्योंकि लद्दाख को छठवें शेड्यूल में संगठित करने का वादा किया गया था। एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, गृह मंत्री अमित शाह ने लद्दाख के नेताओं को फटकार लगाते हुए कहा था कि वह सिक्स शेड्यूल नहीं देंगे, चाहे प्रधानमंत्री खुद लिख के दें।
दिसंबर 2023 से एक उच्च स्तरीय कमेटी (High Power Committee – HPC) लद्दाख की मांगों को लेकर बातचीत कर रही है। गृह मंत्रालय के प्रेस नोट में कहा गया है कि वांगचुक की माँगे एचपीसी की चर्चा का अभिन्न अंग हैं, लेकिन इसमें राज्य का दर्जा देने या छठी अनुसूची को लेकर हुई बातचीत की कोई जानकारी नहीं है। लद्दाख के लोग चार मुख्य माँगें उठा रहे हैं, जिन्हें सरकार अनसुना कर रही है:
- लद्दाख को राज्य का दर्जा: लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाने के बाद लोगों को लगा था कि केंद्र उन पर ध्यान देगा, लेकिन अब उन्हें लगता है कि उनकी स्वायत्तता और जीवन शैली खतरे में है।
- संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करना: लद्दाख में 97% आबादी जनजातीय है, इसलिए वे चाहते हैं कि उन्हें छठी अनुसूची में शामिल किया जाए। इससे उन्हें विधायी और वित्तीय शक्तियाँ मिलेंगी जो अभी दिल्ली से नियंत्रित होती हैं। यह उन्हें बाहरी ताकतों से बचाने और अपनी जनजातीय पहचान, संस्कृति, वन, और भूमि संसाधनों पर नियंत्रण रखने में मदद करेगा।
- पब्लिक सर्विस कमीशन: लद्दाख में ग्रेजुएट बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत (13.4%) के मुकाबले 26.5% है। वे चाहते हैं कि नौकरी के अवसरों के नियम-कानून वे खुद निर्धारित करें।
- संसदीय प्रतिनिधित्व में वृद्धि: वे चाहते हैं कि उनके विकास और प्रतिनिधित्व के लिए कम से कम दो सांसद हों, जबकि वर्तमान में केवल एक प्रतिनिधि है।
सरकार ने अहंकार के साथ बातचीत की है। सरकार केवल दो मांगों पर विचार करने को तैयार है: सेपरेट स्टेट कमीशन और लोकसभा सीटों को एक से बढ़ाकर दो करना। लेकिन राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची में शामिल करना, इन दो मुख्य मांगों को सरकार मानने को तैयार नहीं है।
आंतरिक सुरक्षा और गृह मंत्रालय की आलोचना
गृह मंत्री अमित शाह को अब तक के सबसे फेल्ड और नाकाम गृह मंत्री बताया गया है। आरोप है कि उनके नेतृत्व में लद्दाख जैसी शांत जगह में भी हिंसा की आग भड़क उठी है। आलोचना है कि गृह मंत्री के पास खुफिया जानकारी नहीं होती, न रोकने की तरकीब होती है, और न ही घटना के बाद मजबूत फैसला ले पाते हैं।