आज की दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) एक बड़ा गेम चेंजर बन चुका है। यह तकनीक हमारे जीवन को आसान बनाने से लेकर अर्थव्यवस्था को मजबूत करने तक सब कुछ कर रही है। लेकिन जब बात वैश्विक स्तर पर AI में निवेश की आती है, तो अमेरिका और चीन सबसे आगे हैं, जबकि भारत अभी काफी पीछे चल रहा है। आइए जानते हैं कि भारत कहां खड़ा है और क्या चुनौतियां हैं।
US and China Dominate AI Investments
अमेरिका और चीन का AI निवेश में दबदबा
अमेरिका और चीन AI के क्षेत्र में दुनिया के लीडर हैं। अमेरिका हर साल AI पर करीब 50 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की योजना बना रहा है। यह रकम इतनी बड़ी है कि इससे नई-नई तकनीकें और रिसर्च को बढ़ावा मिलेगा। वहीं, चीन ने पिछले 10 सालों में औसतन 1.75 लाख करोड़ रुपये प्रति वर्ष AI में लगाए हैं। हाल ही में चीन ने 76,000 करोड़ रुपये का एक बड़ा ‘नेशनल AI फंड’ भी शुरू किया है, जो उनके इनोवेशन को और तेज करेगा। ये दोनों देश AI की रेस में इतना आगे हैं कि बाकी देशों को पकड़ना मुश्किल लग रहा है।

उदाहरण के लिए, अमेरिका में कंपनियां जैसे माइक्रोसॉफ्ट और गूगल AI पर अरबों डॉलर लगा रही हैं, जबकि चीन अपनी सरकारी नीतियों से टेक स्टार्टअप्स को सपोर्ट कर रहा है।
India’s Modest Spending on AI
भारत का AI में कम निवेश
भारत की तुलना में देखें तो हमारा निवेश बहुत कम है। दिसंबर 2025 में भारत सरकार ने अगले 5 सालों के लिए सिर्फ 10,300 करोड़ रुपये AI पर आवंटित किए हैं। यानी हर साल लगभग 2,000 करोड़ रुपये। यह अमेरिका के निवेश का 1% से भी कम है! जहां अमेरिका और चीन लाखों करोड़ लगा रहे हैं, वहां भारत का यह बजट छोटा लगता है। लेकिन अच्छी बात यह है कि भारत में युवा टैलेंट बहुत है, जो AI को आगे ले जा सकता है।
हाल ही में भारत सरकार ने ‘इंडिया AI मिशन’ शुरू किया है, जो स्टार्टअप्स और रिसर्च को बढ़ावा देगा। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि हमें और ज्यादा फंडिंग की जरूरत है ताकि हम वैश्विक स्तर पर मुकाबला कर सकें।
India’s Role in AI Value Chain
AI वैल्यू चेन में भारत की भूमिका
भारत AI की दुनिया में अभी ‘सर्विस प्रोवाइडर’ की तरह काम कर रहा है। हमने कभी गूगल या माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी कंपनियां नहीं बनाईं, लेकिन इन कंपनियों को चलाने वाले इंजीनियर भारत से ही आते हैं। भारत AI की ‘वैल्यू चेन’ में नीचे है – हम कॉल सेंटर से नॉलेज सेंटर और अब डेटा सेंटर बनने की ओर बढ़ रहे हैं। लेकिन असली लीडरशिप अभी दूर है।
डॉक्टर बत्रा जैसे विशेषज्ञ कहते हैं कि भारतीय टेक एक्सपर्ट्स अभी ‘प्लंबर’ की तरह काम कर रहे हैं, जो बैकएंड को ठीक करते हैं। हमें ‘ठेकेदार’ बनना चाहिए, यानी लीडर। भारत चैटजीपीटी जैसे सॉफ्टवेयर नहीं बना पा रहा, लेकिन हम इनको चलाने के लिए बैकएंड इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा सेंटर्स दे सकते हैं। आने वाले सालों में भारत में कई बड़े डेटा सेंटर्स बनने वाले हैं, जो AI को सपोर्ट करेंगे।
Challenges Facing India
भारत के सामने चुनौतियां
AI में आगे बढ़ने में भारत को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। हाल ही में गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने एक चीनी रोबोट को अपना बताकर ‘ओमिक्रॉन’ नाम से पेश किया, लेकिन बाद में सच्चाई सामने आने पर शर्मिंदगी हुई। यह दिखाता है कि हम इनोवेशन में कितने पीछे हैं।
एक और बड़ी समस्या है पर्यावरण। डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए बहुत पानी चाहिए, और भारत के कई इलाकों में पहले से पानी की कमी है। अगर हम बिना सोचे-समझे सेंटर्स बनाते हैं, तो पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है।
चीन अब ‘फैक्ट्री ऑफ द वर्ल्ड’ से ‘इनोवेशन हब’ बन चुका है, जहां पेटेंट्स और नई तकनीकें तेजी से आ रही हैं। भारत में गवर्नेंस और इनोवेशन को बढ़ावा देने वाला सिस्टम अभी कमजोर है। हमारे टैलेंटेड लोग अक्सर सिलिकॉन वैली चले जाते हैं क्योंकि यहां मौके कम हैं।
Conclusion: Building an Innovation Ecosystem
निष्कर्ष: इनोवेशन इकोसिस्टम बनाना जरूरी
भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा युवा टैलेंट पूल है, लेकिन सिस्टम की कमियों से यह बर्बाद हो रहा है। हमें सिर्फ बड़े नामों पर फोकस करने के बजाय एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना चाहिए जो असली इनोवेशन को बढ़ावा दे। अगर हम सही नीतियां बनाएं, ज्यादा निवेश करें और पर्यावरण का ध्यान रखें, तो भारत AI की दुनिया में बड़ा प्लेयर बन सकता है। सरकार और प्राइवेट सेक्टर को मिलकर काम करना होगा।
यह AI की रेस में भारत के लिए एक वेक-अप कॉल है। क्या भारत इस मौके को भुना पाएगा? समय बताएगा।