प्रधानमंत्री राहत कोष यानी PM-CARES फंड को लेकर एक बार फिर बड़ी बहस छिड़ गई है। ये फंड 2020 में कोरोना महामारी के समय शुरू किया गया था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कैबिनेट मंत्री और जनता-कॉर्पोरेट घरानों से अरबों-खरबों रुपये जमा हुए। लेकिन अब इसकी पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। एक वीडियो चर्चा में इसे ‘ब्लैक होल’ बताया गया – पैसा जाता है, लेकिन खर्च का हिसाब-किताब बाहर नहीं आता!

1. ब्लैक होल जैसा फंड – पैसा जाता है, जानकारी नहीं!
वीडियो में कहा गया कि PM-CARES में आम लोगों और बड़े-बड़े कंपनियों का पैसा तो भरपूर आया, लेकिन इसका इस्तेमाल कहाँ-कैसे हुआ, इसका पूरा ब्योरा नहीं मिलता। जैसे ब्लैक होल – सब कुछ निगल जाता है, लेकिन कुछ वापस नहीं आता। 2020 में सिर्फ 5 दिनों में ही 3,000 करोड़ रुपये से ज्यादा जमा हो गए थे। कुल मिलाकर अब तक 10,000 करोड़ से ऊपर का फंड इकट्ठा हुआ, लेकिन ऑडिट रिपोर्ट्स और खर्च का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक नहीं किया गया।

2. संसद में भी सवाल नहीं पूछ सकते!
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने लोकसभा को चिट्ठी लिखकर साफ कह दिया – PM-CARES पर संसद में कोई सवाल ‘नॉन-एडमिसेबल’ यानी अस्वीकार्य है। मतलब, सांसद भी इसके खर्च, फैसलों या गड़बड़ियों पर सवाल नहीं पूछ सकते।
ये लोकतंत्र के लिए बड़ा झटका है। संसद तो जनता की आवाज होती है, लेकिन यहां फंड को सवालों से ऊपर रख दिया गया।

3. RTI से भी बच निकला फंड
आरटीआई (Right to Information) कानून के तहत सिर्फ ‘पब्लिक अथॉरिटी’ से जानकारी मांगी जा सकती है। सरकार ने PM-CARES को ‘पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट’ बताकर इससे अलग कर दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट ने भी इसे ‘जुरिस्टिक पर्सन’ माना और कहा कि इसे RTI की धारा 8(1)(j) के तहत गोपनीयता मिली हुई है। आयकर विभाग ने भी फंड की छूट के दस्तावेज मांगे, तो हाईकोर्ट ने आयकर कानून की धारा 138 का हवाला देकर रोक लगा दी। RTI और इनकम टैक्स के बीच ये टकराव अब कानूनी लड़ाई बन गया है।

4. जवाबदेही की मांग – प्रधानमंत्री का नाम, जनता का पैसा!
चर्चा में ये तर्क दिया गया कि फंड में प्रधानमंत्री का नाम है, कैबिनेट मंत्री ट्रस्टी हैं, और पैसा जनता का है। फिर जवाबदेही क्यों नहीं?
अगर इसे सवालों से बाहर रखा गया, तो ये लोकतंत्र के लिए खतरनाक परंपरा बन जाएगी। अंत में सवाल उठा – “रक्षक की निगरानी कौन करेगा?” (Who will watch the watchdog?)
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?
कई विपक्षी नेता और कार्यकर्ता कह रहे हैं कि लोकतंत्र में कोई भी फंड या सत्ता सवालों से ऊपर नहीं हो सकती। PM-CARES ने अच्छा काम किया – ऑक्सीजन प्लांट, वैक्सीन, अस्पताल बनवाए – लेकिन पारदर्शिता न होने से शक पैदा होता है।
सरकार का दावा है कि फंड का इस्तेमाल पूरी तरह ऑडिटेड है, लेकिन स्वतंत्र ऑडिटर की रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं। 2024-25 में भी फंड सक्रिय है, लेकिन अपडेट्स कम हैं।
PM-CARES फंड अच्छा उद्देश्य लेकर शुरू हुआ, लेकिन अगर जवाबदेही न हुई, तो ये लोकतंत्र की नींव को कमजोर कर सकता है। क्या सरकार अब पारदर्शिता बढ़ाएगी? जनता इंतजार कर रही है।