Oplus_131072
ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले भारतीय मूल के लेखक, इंजीनियर और राजनीतिक कार्यकर्ता बिल कोल साहब ने हाल ही में मयूर जानी ऑफिशियल मंच पर भारतीय प्रवासियों के प्रति बढ़ते नकारात्मक माहौल पर चर्चा की। जम्मू से ताल्लुक रखने वाले बिल कोल, जो कई दशकों से ऑस्ट्रेलिया में रह रहे हैं, ने इस समस्या के कारणों और समाधानों पर विस्तार से बात की।
क्यों बढ़ रही है भारतीयों के खिलाफ नफरत?
बिल कोल ने बताया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा जनसंख्या वाला देश है, और हर साल लगभग 25 लाख लोग भारत से विदेशों में जाते हैं। ऑस्ट्रेलिया में पिछले 12 सालों में भारतीय मूल के लोगों की संख्या तेजी से बढ़ी है और अब करीब 10 लाख भारतीय वहां रहते हैं, जिनमें से दो-तिहाई ऑस्ट्रेलियाई नागरिक हैं।
इसके कई कारण हैं:
- आबादी और रोजगार: पश्चिमी देशों में स्थानीय आबादी कम हो रही है और उन्हें कामगारों की जरूरत है। भारतीय लोग ब्लू-कॉलर (शारीरिक श्रम) और व्हाइट-कॉलर (पेशेवर) नौकरियों में यह कमी पूरी कर रहे हैं।
- फार-राइट का प्रभाव: बिल कोल के अनुसार, अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों में फार-राइट (कट्टर दक्षिणपंथी) पार्टियों का उभार हुआ है, जो भारतीयों को आसान निशाना बना रहे हैं।
- सांस्कृतिक अंतर: भारतीयों के कपड़े, खान-पान (हाथ से खाना), भाषा और धर्म पश्चिमी लोगों से अलग हैं, जिसे फार-राइट समूह निशाना बनाने का बहाना बनाते हैं।
- भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि: हाल के भारत-पाकिस्तान विवाद के बाद भारत की वैश्विक छवि कमजोर हुई है, जिससे भारतीय प्रवासी सॉफ्ट टारगेट बन गए हैं।
- प्रवासियों का व्यवहार: हाल के वर्षों में आए कुछ भारतीय प्रवासियों का व्यवहार और सिविक सेंस (नागरिक शिष्टाचार) ठीक नहीं रहा। बिल कोल ने कहा कि पहले के प्रवासियों ने ऑस्ट्रेलियाई मूल्यों को अपनाया, लेकिन नए प्रवासियों में “हमारा हक है” जैसी मानसिकता देखी जा रही है।
- घरेलू हिंसा: ऑस्ट्रेलिया में भारतीय समुदाय में घरेलू हिंसा की दर अधिक होने की वजह से भी बदनामी हुई है।
- भारतीय राजनीति का प्रभाव: पिछले 10 सालों में भारत की राजनीति ऑस्ट्रेलिया में भी पहुंची है। कुछ साल पहले ऑस्ट्रेलियाई खुफिया एजेंसी ने भारत के राजनयिकों को वापस भेजा था, क्योंकि उन पर ऑस्ट्रेलियाई नीतियों को प्रभावित करने का आरोप लगा था।
विरोध प्रदर्शन और तनाव
अगस्त 2025 में ऑस्ट्रेलिया के कई शहरों में “मार्च फॉर ऑस्ट्रेलिया” नाम से एंटी-इमिग्रेशन रैलियां हुईं, जो खास तौर पर भारतीय समुदाय को निशाना बना रही थीं। इन रैलियों में “भारतीय प्रवास से सांस्कृतिक बदलाव” जैसे नारे लगाए गए। मेलबर्न विश्वविद्यालय के भारतीय छात्रों को उस दिन सुरक्षित रहने की सलाह दी गई थी, और क्वींसलैंड में भारतीय श्रमिकों को काम पर न जाने को कहा गया।
हालांकि, बिल कोल ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया एक मजबूत लोकतंत्र है, जहां विरोध की आजादी है। उन्होंने यह भी कहा कि इन रैलियों से पहले प्रो-फिलिस्तीनी रैलियां भी हुई थीं, जिनमें दोगुने लोग शामिल थे।
आगे की राह: बिल कोल की सलाह
बिल कोल इस स्थिति को लेकर आशावादी हैं। उनका मानना है कि ऑस्ट्रेलिया एक सहिष्णु देश है, और यह नफरत की लहर भी पुराने प्रवासी समुदायों (जैसे इटालियंस और वियतनामी) की तरह खत्म हो जाएगी। उन्होंने भारतीय प्रवासियों को निम्नलिखित सलाह दी:
- आत्मनिरीक्षण करें: भारतीयों को ऑस्ट्रेलियाई मूल्यों जैसे समानता, न्याय और सम्मान को अपनाना होगा।
- टॉल पपी सिंड्रोम से बचें: ऑस्ट्रेलिया में कोई भी खुद को दूसरों से बड़ा नहीं दिखा सकता। भारतीयों को यह नहीं जताना चाहिए कि मेजबान देश उनके बिना अधूरा है।
- भारत की ताकत बढ़ाएं: भारत की वैश्विक छवि और ताकत भारतीय प्रवासियों के लिए सुरक्षा कवच है। जैसे चीन के नागरिकों को उनकी ताकत के कारण निशाना नहीं बनाया जाता, वैसे ही भारत को भी मजबूत होना होगा।
- नेहरू-गांधी का उदाहरण: बिल कोल ने कहा कि नेहरू और गांधी जैसे नेताओं को पश्चिम में सम्मान मिलता है, क्योंकि वे मानवीय और धर्मनिरपेक्ष छवि वाले नेता थे। भारत को ऐसी विश्वसनीय छवि बनाए रखनी चाहिए।
संदर्भ: मयूर जानी ऑफिशियल मंच पर बिल कोल के साथ चर्चा और अन्य स्रोत।