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भारत सरकार जम्मू-कश्मीर में चेनाब नदी पर एक बड़ी जल विद्युत परियोजना को आगे बढ़ा रही है। यह सावलकोट बांध परियोजना है, जो 1865 मेगावाट बिजली पैदा करेगी। लेकिन इसमें पर्यावरण को नुकसान पहुंचने की आशंका भी है। आइए जानते हैं इस परियोजना के बारे में आसान भाषा में।
परियोजना क्या है और कहां बनेगी?
सावलकोट बांध जम्मू-कश्मीर में चेनाब नदी पर बन रहा है। यह परियोजना दो हिस्सों में पूरी होगी। पहले हिस्से में ज्यादा बिजली बनेगी। इसकी शुरुआत 1984 में हुई थी, लेकिन केंद्र और राज्य सरकार के बीच मतभेद के कारण रुक गई। अब पर्यावरण मंत्रालय की विशेषज्ञ समिति (EAC) इसे जल्दी हरी झंडी दे सकती है।
क्यों है यह परियोजना इतनी महत्वपूर्ण?
पहलगाम हमले के बाद सरकार इसे रणनीतिक रूप से देख रही है। इसका मकसद चेनाब नदी की पूरी जल शक्ति का इस्तेमाल करना है। इससे जम्मू-कश्मीर में बुनियादी सुविधाएं मजबूत होंगी और सेना के ठिकानों को लगातार बिजली मिलेगी। भारत पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिए जल कूटनीति का इस्तेमाल कर रहा है। पहलगाम हमले के बाद इंडस वाटर ट्रीटी को कुछ समय के लिए रोका गया था। इस परियोजना से भारत अपने हिस्से के पानी का पूरा फायदा उठा सकेगा।
बांध का प्रकार और उठ रहे सवाल
सरकार इसे ‘रन ऑफ द रिवर’ परियोजना बता रही है। इसका मतलब है कि नदी के पानी के बहाव में बिना रुकावट के बिजली बनाई जाएगी। यह पर्यावरण के लिए अच्छा माना जाता है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह सच्चाई नहीं है। यहां 192.5 मीटर ऊंचा कंक्रीट का बांध बनेगा, जो 1159 हेक्टेयर में पानी का बड़ा तालाब बनाएगा। इतने बड़े निर्माण से इसे रन ऑफ द रिवर नहीं कहा जा सकता।
पर्यावरण की मंजूरी और विवाद
पर्यावरण मंत्रालय की EAC परियोजना का पर्यावरणीय असर जांच रही है। वन विभाग की FAC ने पहले ही जंगल काटने की अनुमति दे दी है। लेकिन आलोचना हो रही है क्योंकि संचयी प्रभाव का आकलन (CIA) और वहन क्षमता अध्ययन (CCS) नहीं किया गया। ये 2013 के नियम हैं, लेकिन FAC कहती है कि परियोजना पुरानी है तो जरूरी नहीं। बिजली और गृह मंत्रालय ने दबाव डाला कि रणनीतिक महत्व के कारण जल्दी मंजूरी दें। विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे 2 लाख से ज्यादा पेड़ कटेंगे और 846 हेक्टेयर जंगल प्रभावित होगा।
इंडस वाटर ट्रीटी क्या है?
यह समझौता 1960 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ था। विश्व बैंक ने इसमें मदद की। पाकिस्तान को सिंधु, झेलम और चेनाब नदियों का ज्यादा पानी मिलता है। भारत इनका सीमित इस्तेमाल कर सकता है, जैसे बिजली बनाने के लिए। लेकिन पूर्वी नदियां रावी, ब्यास और सतलुज पूरी तरह भारत की हैं।
यह परियोजना भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगी, लेकिन पर्यावरण संरक्षण पर सवाल बने रहेंगे। सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए यह जरूरी है। आगे देखना होगा कि EAC क्या फैसला लेती है।