भारत के परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा बदलाव आ गया है। संसद ने ‘सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया’ यानी शांति बिल 2025 को मंजूरी दे दी है। राष्ट्रपति ने भी इस पर मुहर लगा दी है। अब यह कानून बन चुका है। इस बिल से परमाणु बिजली बनाने के क्षेत्र में निजी कंपनियां भी हिस्सा ले सकेंगी। पहले यह सिर्फ सरकार के हाथ में था।

शांति बिल क्या है और क्यों लाया गया?
शांति बिल का पूरा नाम है – सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया। यह दो पुराने कानूनों की जगह लेगा:
- परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962
- परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम, 2010
इसका मुख्य मकसद भारत को 2047 तक 100 गीगावाट (GW) परमाणु बिजली बनाने की क्षमता तक पहुंचाना है। अभी भारत में सिर्फ करीब 8-9 GW परमाणु बिजली है, जो कुल बिजली का सिर्फ 3% है। सरकार चाहती है कि कोयले की जगह साफ और स्थिर परमाणु ऊर्जा ज्यादा इस्तेमाल हो, ताकि प्रदूषण कम हो और बिजली की कमी न रहे।

निजी कंपनियां अब क्या कर सकेंगी?
- भारतीय निजी कंपनियां परमाणु प्लांट बना सकती हैं, चलाती हैं और बंद भी कर सकती हैं।
- विदेशी कंपनियां भारतीय पार्टनर के साथ जॉइंट वेंचर में काम कर सकती हैं।
- लेकिन ईंधन बनाना, खनन और कुछ संवेदनशील काम सिर्फ सरकार के पास रहेंगे।
- छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर (SMR) बनाने पर खास जोर है। ये छोटे प्लांट जल्दी बनते हैं और सुरक्षित होते हैं। सरकार 2033 तक 5-6 ऐसे रिएक्टर शुरू करना चाहती है।

दुर्घटना होने पर मुआवजा कैसे मिलेगा?
यह हिस्सा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा। नए कानून में:
- प्लांट चलाने वाली कंपनी की जिम्मेदारी रिएक्टर के साइज के हिसाब से सीमित होगी (ग्रेडेड कैप)।
- उपकरण सप्लायर को तब तक जिम्मेदार नहीं ठहराया जाएगा, जब तक स्पेशल कॉन्ट्रैक्ट में ऐसा न लिखा हो।
- अगर नुकसान ज्यादा हुआ तो बाकी पैसा सरकार देगी।
सरकार का कहना है कि इससे निवेश आएगा और तकनीक बेहतर होगी। लेकिन विपक्ष और कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे आम लोगों की सुरक्षा कम हो सकती है।

आसान उदाहरण से समझें
मान लीजिए कोई एयरलाइन कंपनी है। अगर प्लेन क्रैश होता है, तो कंपनी को सिर्फ एक तय रकम ही देनी पड़ेगी। अगर नुकसान इससे ज्यादा हुआ, तो बाकी पैसा सरकार (यानी आपके टैक्स से) भरेगी। इससे कंपनियां निवेश करने को तैयार होती हैं, लेकिन आम लोगों का रिस्क बढ़ जाता है।