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सुप्रीम कोर्ट ने वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2024 के कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों पर अंतरिम रोक लगा दी है, जिससे सरकार के वक्फ प्रशासन को आधुनिक बनाने और सुव्यवस्थित करने के प्रयासों को आंशिक झटका लगा है। इस अधिनियम का देश भर में, विशेष रूप से मुस्लिम संगठनों और विपक्षी दलों ने कड़ा विरोध किया था, जिन्होंने इसे धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और संपत्ति के अधिकारों का उल्लंघन बताया था।
मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति ए जी मसीह की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले में अंतरिम आदेश जारी किया। कोर्ट ने पूरे कानून को निलंबित करने के बजाय इसके कुछ खास प्रावधानों पर रोक लगाई है, जो मौलिक अधिकारों और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करते हैं।
प्रमुख प्रावधानों पर रोक
- ‘5 साल से इस्लाम का अभ्यास’ की शर्त पर रोक:
संशोधन अधिनियम में यह नियम था कि वक्फ संपत्ति बनाने या घोषित करने के लिए व्यक्ति को कम से कम 5 साल तक इस्लाम का अभ्यास करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रावधान को मनमाना बताते हुए इस पर रोक लगा दी, क्योंकि ‘अभ्यास करने वाला मुस्लिम’ की परिभाषा तय करने का कोई स्पष्ट मापदंड नहीं है। कोर्ट ने कहा कि अगर राज्य सरकारें इस संबंध में नियम बनाती हैं, तो इस प्रावधान को फिर से लागू किया जा सकता है। - कलेक्टरों की शक्तियों पर अंकुश:
नए कानून में कलेक्टरों और सरकारी अधिकारियों को वक्फ संपत्तियों के विवादों का निपटारा करने, राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव करने और अतिक्रमण की जांच करने की व्यापक शक्तियां दी गई थीं। सुप्रीम कोर्ट ने इन शक्तियों को निलंबित कर दिया, क्योंकि संपत्ति के अधिकारों पर फैसला करना न्यायपालिका का क्षेत्र है, न कि कार्यकारी अधिकारियों का। कोर्ट ने इसे शक्तियों के पृथक्करण और नियत प्रक्रिया का उल्लंघन माना। - वक्फ निकायों में गैर-मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर सीमा:
संशोधन में केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने का प्रावधान था, जिसे समावेशिता और विशेषज्ञता बढ़ाने के लिए लाया गया था। हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने इसे अल्पसंख्यक धार्मिक स्वायत्तता का उल्लंघन बताया। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सीमा तय की है—केंद्रीय वक्फ परिषद में अधिकतम चार और राज्य वक्फ बोर्डों में अधिकतम तीन गैर-मुस्लिम सदस्य हो सकते हैं। साथ ही, वक्फ बोर्ड या परिषद का सीईओ या पदेन सदस्य जहां तक संभव हो मुस्लिम होना चाहिए।
कानूनी आधार और कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में मनमानी, शक्तियों के पृथक्करण के उल्लंघन और अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा को आधार बनाया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संसद को कानून बनाने का अधिकार है, लेकिन यह मौलिक अधिकारों की कीमत पर नहीं हो सकता।
क्या रहा बरकरार?
- सभी वक्फ संपत्तियों के अनिवार्य पंजीकरण का प्रावधान अभी लागू रहेगा।
- अन्य प्रशासनिक और प्रक्रियात्मक सुधारों पर कोई रोक नहीं लगाई गई है।
आगे क्या?
यह अंतरिम आदेश केवल चुनिंदा प्रावधानों को अस्थायी रूप से रोकता है, पूरे कानून को नहीं। मामला अब अंतिम सुनवाई के लिए जाएगा। कोर्ट ने संकेत दिया है कि राज्य सरकारें ‘अभ्यास करने वाले मुस्लिम’ की परिभाषा के लिए नियम बना सकती हैं। केंद्र सरकार भी कोर्ट की चिंताओं को दूर करने के लिए संशोधन पर विचार कर सकती है।
इस फैसले से वक्फ प्रशासन और धार्मिक स्वायत्तता के बीच संतुलन को लेकर बहस और तेज हो सकती है।