सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (29 जनवरी 2026) को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) के नए नियमों पर रोक लगा दी है। ये नियम कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में जाति आधारित भेदभाव रोकने के लिए लाए गए थे, लेकिन इन्हें भेदभावपूर्ण और दुरुपयोग होने वाला बताया गया। कोर्ट ने कहा कि फिलहाल 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे।
कोर्ट ने क्या सख्त बातें कही?
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी देश जातिवाद से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाया है। नए नियमों से समाज “पीछे” जा रहा है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि हमारे शिक्षण संस्थानों में एकता दिखनी चाहिए, अमेरिका जैसी स्थिति नहीं होनी चाहिए जहां कभी अश्वेतों और श्वेतों के लिए अलग-अलग कॉलेज थे।
नए नियमों में क्या समस्या थी?
- हर कॉलेज में ‘इक्विटी कमेटी’ बनानी अनिवार्य थी, जिसमें SC, ST, OBC, विकलांग और महिला सदस्य होने जरूरी थे। लेकिन सामान्य वर्ग (जनरल कैटेगरी) के लिए कोई अनिवार्य जगह नहीं थी।
- अगर कोई शिकायत झूठी साबित होती है, तो शिकायत करने वाले पर कोई सजा नहीं होती थी। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इससे निजी दुश्मनी निकालने के लिए नियमों का गलत इस्तेमाल बढ़ सकता है।
- याचिकाकर्ता विष्णु शंकर जैन जैसे लोगों ने तर्क दिया कि ये नियम संविधान के समानता के अधिकार के खिलाफ हैं और समाज में नई तरह का वर्गभेद पैदा करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है?
कोर्ट ने नए नियमों को अस्पष्ट और दुरुपयोग की आशंका वाला बताया। इन्हें अगले आदेश तक रोक दिया गया है। केंद्र सरकार और UGC को नोटिस जारी किया गया है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि प्रतिष्ठित लोगों और कानून विशेषज्ञों की एक कमेटी इन नियमों की दोबारा समीक्षा करे।
अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को होगी।
समाज पर क्या असर?
उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में सामान्य वर्ग के छात्रों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। वहीं, पिछड़ी जातियों के लोग कहते हैं कि वे लंबे समय से भेदभाव झेल रहे हैं, इसलिए ऐसे नियम उनके संरक्षण के लिए जरूरी हैं। इस मुद्दे पर विपक्षी दल ज्यादातर चुप्पी साधे हुए हैं।
यह मामला शिक्षा जगत में बड़ी बहस छेड़ रहा है, जहां एक तरफ जातिगत भेदभाव रोकने की जरूरत है, तो दूसरी तरफ सभी के लिए समान नियमों की मांग है।