मध्य पूर्व में एक “अरब नाटो” बनाने की चर्चा फिर से जोर पकड़ रही है। इसका कारण हाल ही में क़तर की राजधानी दोहा में इज़राइली फाइटर जेट्स द्वारा एक इमारत पर किया गया हमला है। यह इमारत कोई साधारण जगह नहीं थी, बल्कि वहाँ इज़राइली बंधकों को छुड़ाने और हमास व इज़राइल के बीच शांति वार्ता के लिए मध्यस्थता चल रही थी। इस हमले ने अरब देशों में हलचल मचा दी है। क़तर के अमीर ने सभी अरब देशों से एकजुट होने की अपील की और कहा, “आज हम पर हमला हुआ, कल कोई और अरब देश निशाना बन सकता है।”
क्यों उठ रही है “अरब नाटो” की मांग?
क़तर में अमेरिका का बड़ा सैन्य अड्डा, अल-उदीद एयरबेस, मौजूद है, जहाँ 120 से ज्यादा अमेरिकी फाइटर जेट्स तैनात हैं। फिर भी, इज़राइल, जो अमेरिका का सहयोगी है, ने दोहा पर हमला किया। इससे अरब देशों में यह सवाल उठा कि क्या वे अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह अमेरिका पर निर्भर रह सकते हैं। क़तर ने प्रस्ताव रखा कि अरब देशों को नाटो की तरह एक साझा सुरक्षा संगठन बनाना चाहिए, जिसमें कोई एक देश पर हमला होने पर सभी देश मिलकर जवाब दें।
अमेरिका की भूमिका पर सवाल
हमले के बाद बुलाई गई आपात बैठक में यह सवाल उठा कि क्या अमेरिका को इस हमले की जानकारी थी। तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उन्हें इसकी कोई खबर नहीं थी, और अगर होती तो वे अपने सैन्य अड्डे का इस्तेमाल कर हमला रोक देते। लेकिन अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो ने इज़राइल जाकर कहा कि अमेरिका सिर्फ फ़िलिस्तीन पर कब्ज़ा करने के बारे में नहीं सोचता, बल्कि “ग्रेटर इज़राइल” का लक्ष्य रखता है। इस बयान ने अरब देशों की चिंताएँ और बढ़ा दीं।
अरब देशों में एकता की चुनौतियाँ
अरब देशों के बीच एकजुटता की कमी सबसे बड़ी रुकावट है। सऊदी अरब और क़तर के बीच मुस्लिम ब्रदरहुड को लेकर मतभेद हैं। क़तर का अल-जज़ीरा चैनल अक्सर सऊदी सरकार की आलोचना करता है। वहीं, क़तर और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) लीबिया जैसे मुद्दों पर अलग-अलग पक्षों का समर्थन करते हैं। कुवैत फ़िलिस्तीन का समर्थन करता है, जबकि यूएई जैसे देश इज़राइल के साथ अब्राहम समझौते के तहत करीबी संबंध बना रहे हैं। पहले भी अरब लीग (1945), संयुक्त रक्षा संधि (1950) और खाड़ी सहयोग परिषद जैसे प्रयास हुए, लेकिन आपसी मतभेदों के कारण कोई मजबूत गठबंधन नहीं बन सका।
पाकिस्तान और तुर्की की भूमिका
पाकिस्तान और तुर्की भी इस चर्चा में शामिल हैं। पाकिस्तान ने इस्लामिक देशों के नेतृत्व की कोशिश की, लेकिन उसकी आर्थिक कमज़ोरी और अमेरिका पर निर्भरता के कारण अरब देश उस पर भरोसा नहीं करते। तुर्की, जो नाटो का सदस्य है, “अरब नाटो” में शामिल होना चाहता है, लेकिन उसका अमेरिका और इज़राइल के साथ नाटो गठबंधन इसे जटिल बनाता है।
इज़राइल की सैन्य ताकत
इज़राइल के पास आयरन डोम और एरो 3 जैसे उन्नत हथियार हैं, जो उसे क्षेत्र में सैन्य रूप से मज़बूत बनाते हैं। किसी भी “अरब नाटो” को इज़राइल से मुकाबले के लिए अपनी सैन्य क्षमता को बहुत बढ़ाना होगा।
भारत का रुख
भारत के लिए मध्य पूर्व बहुत महत्वपूर्ण है। लाखों भारतीय वहाँ काम करते हैं और भारत को अपनी तेल ज़रूरतों का 53% हिस्सा खाड़ी देशों से मिलता है। भारत रक्षा उपकरणों का निर्यात भी कर सकता है, लेकिन वह इज़राइल के साथ अपने मजबूत रक्षा संबंधों को जोखिम में नहीं डालेगा। भारत ने हमास और इज़राइल के बीच शांति की वकालत की है और तनाव कम करने की बात कही है।
क्या बनेगा “अरब नाटो”?
“अरब नाटो” का विचार आकर्षक है, लेकिन अरब देशों के बीच आपसी मतभेद, इज़राइल के साथ कुछ देशों के बढ़ते संबंध और एक मज़बूत सैन्य गठबंधन की कमी इसे मुश्किल बनाती है। क्या यह सपना हकीकत बनेगा, यह भविष्य पर निर्भर करता है।