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नागालैंड में 48 साल पुरानी नौकरी आरक्षण नीति को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। यह मुद्दा राज्य में सामाजिक और राजनीतिक तनाव का कारण बन रहा है, क्योंकि पाँच गैर-पिछड़ी जनजातियाँ इस नीति की समीक्षा या समाप्ति की मांग कर रही हैं।
क्या है विवाद?
नागालैंड में 1967 में शुरू हुई आरक्षण नीति को 1977 में संशोधित किया गया था। इसके तहत राज्य की सरकारी नौकरियों का 80% हिस्सा स्वदेशी अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित है। इसमें से 37% नौकरियाँ पिछड़ी जनजातियों (backward tribes) के लिए हैं, जिनमें पूर्वी नागालैंड की सात जनजातियों के लिए 25% और अन्य पिछड़ी जनजातियों के लिए 12% शामिल हैं।
पाँच गैर-पिछड़ी जनजातियाँ—अंगामी, आओ, लोथा, रंगमा, और सुनुमी—इस नीति को बदलने की मांग कर रही हैं। इनका कहना है कि यह नीति अब आज के सामाजिक-आर्थिक हालात से मेल नहीं खाती। इन जनजातियों ने एक समिति बनाई है, जिसे CORP (Committee of Reservation Review Policy) कहा जाता है।
CORP की मांगें
CORP का कहना है कि कुछ पिछड़ी जनजातियाँ अब काफी विकसित हो चुकी हैं और वे गैर-पिछड़ी जनजातियों के नौकरी के अवसर छीन रही हैं। उनकी मुख्य मांगें हैं:
- आरक्षण नीति की समीक्षा या इसे खत्म करना।
- 20% अनारक्षित नौकरियों को गैर-पिछड़ी जनजातियों के लिए आरक्षित करना।
- नीति को वर्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थिति के अनुसार ढालना।
CORP का दावा है कि गैर-पिछड़ी जनजातियों के पास 64% नौकरियाँ हैं, जबकि पिछड़ी जनजातियों के पास 34% हैं। लेकिन वे इस डेटा पर भरोसा नहीं करते और मानते हैं कि नौकरियों में असंतुलन है। समिति ने यह भी कहा कि वे आरक्षण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि केवल नीति को बेहतर करना चाहते हैं।
सरकार का रुख
नागालैंड सरकार ने इस मुद्दे पर समीक्षा आयोग बनाने का वादा किया था। लेकिन सरकार का कहना है कि कोई बड़ा बदलाव 2027 की जनगणना के बाद ही संभव है, क्योंकि इसके लिए सटीक डेटा चाहिए। सरकार ने दो समितियाँ—अगस्त आयोग और सितंबर आयोग—बनाईं, लेकिन CORP ने इन्हें खारिज कर दिया। इस वजह से यह मुद्दा अभी गतिरोध में है।
क्यों है यह विवाद महत्वपूर्ण?
यह विवाद नागालैंड में जनजातियों के बीच एकता और सामाजिक सौहार्द के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। खासकर पूर्वी नागालैंड और मध्य नागालैंड के बीच तनाव बढ़ सकता है। पूर्वी नागालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ENPO) पहले से ही ‘फ्रंटियर नागालैंड’ के रूप में अलग राज्य की मांग कर रहा है। अगर पिछड़ी जनजातियों का आरक्षण कम होता है, तो यह अलगाववादी भावनाओं को और हवा दे सकता है।
आगे क्या?
सरकार का कहना है कि वह इस मुद्दे को सुलझाने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन कोई भी फैसला डेटा और तथ्यों के आधार पर होगा। फिलहाल, यह विवाद नागालैंड की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति को और जटिल बना रहा है।