भारत का कपड़ा उद्योग कृषि के बाद सबसे बड़ा रोजगार देने वाला क्षेत्र है। लेकिन अमेरिका और बांग्लादेश के बीच हुए नए व्यापार समझौते ने इस उद्योग को बड़ा खतरा पैदा कर दिया है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि क्या हो रहा है और भारत पर इसका क्या असर पड़ेगा।

भारतीय कपड़ा उद्योग: महिलाओं का बड़ा सहारा
भारत में 4.5 करोड़ से ज्यादा लोग कपड़ा उद्योग में काम करते हैं। इनमें सबसे ज्यादा महिलाएं हैं। यह क्षेत्र सिर्फ रोजगार नहीं देता, बल्कि गांव-गांव की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाता है।
भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा फाइबर (रेशा) बनाने वाला देश है। टेक्निकल कपड़ों (जैसे मेडिकल ड्रेस, कार के पार्ट्स) में हम पांचवें नंबर पर हैं। अमेरिका हमारा सबसे बड़ा बाजार है, जहां हम टेक्सटाइल बेचते हैं।
नया समझौता क्या है?
अमेरिका ने बांग्लादेश पर लगने वाला टैरिफ (आयात शुल्क) 20% से घटाकर 19% कर दिया है। लेकिन सबसे बड़ी बात ‘जीरो टैरिफ क्लॉज’ है।
अगर बांग्लादेश अमेरिका का कॉटन या मैन-मेड फाइबर (कृत्रिम रेशा) इस्तेमाल करके कपड़े बनाएगा, तो अमेरिका में उस पर 0% टैरिफ लगेगा। यानी बांग्लादेश के कपड़े अमेरिका में बिल्कुल सस्ते पड़ेंगे।
भारत पर दोहरी मार क्यों?
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तैयार कपड़ों (अपैरल) में कड़ी टक्कर बांग्लादेश में मजदूरी भारत से बहुत कम है। उनके पास बड़ी-बड़ी फैक्टरियां हैं, जहां एक साथ लाखों कपड़े बनते हैं। भारत में ज्यादातर छोटी-छोटी इकाइयां (MSME) हैं, जिनकी लागत ज्यादा आती है।
टैरिफ में सिर्फ 1% की कमी भी बड़े ऑर्डर पर लाखों डॉलर का फर्क कर देती है। नतीजा? बांग्लादेश के कपड़े अमेरिका में ज्यादा बिकेंगे, भारत के कम।

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कॉटन यार्न (सूती धागा) का नुकसान बांग्लादेश भारत का सबसे बड़ा खरीदार है। वह हर साल 1.47 बिलियन डॉलर का भारतीय यार्न खरीदता है। लेकिन अब अगर बांग्लादेश जीरो टैरिफ का फायदा लेने के लिए अमेरिका से कॉटन मंगाएगा, तो भारतीय यार्न की बिक्री रुक सकती है।
यह भारत के लाखों किसानों और मिलों को सीधा नुकसान पहुंचाएगा।

भारत की कमजोरियां
- चीन प्लस वन नीति का फायदा वियतनाम और बांग्लादेश ने ज्यादा लिया, भारत कम।
- हमारी फैक्टरियां छोटी-छोटी हैं, बड़े स्केल पर उत्पादन नहीं हो पाता।
- लागत ज्यादा, प्रतिस्पर्धा कम।
सरकार क्या कर रही है?
सरकार ने पीएम मित्रा स्कीम शुरू की है, जिसमें 7 बड़े टेक्सटाइल पार्क बनाए जा रहे हैं। साथ ही ‘समर्थ 2.0’ से मजदूरों को ट्रेनिंग दी जा रही है।
लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि सिर्फ नई योजनाएं काफी नहीं। इन्हें तेजी से लागू करना होगा। बड़े सुधार चाहिए, ताकि हम वैश्विक बाजार में टिक सकें।

यह डील भारत के लिए चेतावनी है। अगर हमने अपनी फैक्टरियों को बड़ा और सस्ता नहीं बनाया, तो लाखों नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं। लेकिन सही कदम उठाए गए तो यह मौका भी बन सकता है।
क्या सरकार तेजी दिखाएगी? या बांग्लादेश आगे निकल जाएगा? समय बताएगा।