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फ्रांस में इन दिनों बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं, जहाँ लाखों लोग सड़कों पर उतरकर सरकार के खिलाफ अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। खबरों के मुताबिक, कई लोगों को हिरासत में लिया गया है, बसों में आग लगाई गई है, और ट्रेन सेवाएँ बाधित की गई हैं, जिससे देश का माहौल तनावपूर्ण हो गया है। ये प्रदर्शन किसी एक विचारधारा तक सीमित नहीं हैं; इसमें वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों समूह शामिल हैं।
प्रदर्शनों का मूल कारण इन विरोध प्रदर्शनों का मुख्य कारण सरकार द्वारा लागू किए गए कड़े वित्तीय उपाय हैं, जिनमें 44 बिलियन यूरो की सार्वजनिक खर्च में कटौती की जा रही है। इन उपायों में शामिल हैं:
- सामाजिक सेवाओं में कमी: स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण जैसे क्षेत्रों में सरकारी खर्च कम किया जा रहा है।
- सार्वजनिक अवकाश खत्म करना: उत्पादकता बढ़ाने के लिए कुछ छुट्टियाँ समाप्त की जा रही हैं।
- वेतन पर अंकुश: सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के वेतन को स्थिर किया गया है या कहीं-कहीं कम किया गया है।
- पेंशन और रिटायरमेंट लाभों में कटौती: पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों पर भी असर पड़ रहा है।
- सरकारी सब्सिडी और स्थानीय खर्चों में कमी: कई सब्सिडी और स्थानीय कार्यक्रमों का बजट घटाया जा रहा है।
लोग पहले से ही तेज़ मुद्रास्फीति और क्रय शक्ति में कमी से परेशान थे, और इन नीतियों ने उनकी वास्तविक आय और जीवन स्तर को और प्रभावित किया है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और सरकार का रवैया फ्रांस में हाल के वर्षों में कई बार प्रधानमंत्रियों का बदलाव हुआ है। पूर्व प्रधानमंत्री फ्रांकोइस बायरो ने इन वित्तीय कटौतियों को बजट में शामिल किया था, जिसके बाद भारी विरोध हुआ और संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। उनके इस्तीफे के बाद राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रोन ने सेबेस्टियन लेकोनू को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किया। लेकिन जनता का मानना है कि लेकोनू मैक्रोन के वफादार हैं और पुरानी नीतियों को ही आगे बढ़ाएँगे, जिससे प्रदर्शन और तेज़ हो गए हैं। यूनियन और विपक्षी दलों का कहना है कि मैक्रोन इन कटौतियों को केवल “नया रूप” दे रहे हैं, लेकिन इनसे पीछे नहीं हट रहे।
सरकार का तर्क है कि ये कटौतियाँ देश के घाटे को कम करने और यूरोपीय संघ के राजकोषीय नियमों का पालन करने के लिए ज़रूरी हैं। मैक्रोन और लेकोनू ने इन उपायों का बचाव करते हुए कहा है कि ये फ्रांस को कर्ज संकट से बचाने और सार्वजनिक वित्त को स्थिर करने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
प्रदर्शनों की प्रकृति और शामिल लोग फ्रांस में “सब कुछ रोक दो” नाम का एक आंदोलन चल रहा है, जो वामपंथी और दक्षिणपंथी दोनों विचारधाराओं को एक मंच पर ला रहा है, जो फ्रांस में असामान्य है।
- दक्षिणपंथी समूह: मैक्रोन की “अभिजात्यवादी नीतियों” का विरोध कर रहे हैं।
- वामपंथी और यूनियनें: वेतन कटौती, पेंशन सुधार और सामाजिक खर्च में कमी के खिलाफ हैं।
- छात्र और युवा: नौकरी के अवसरों में कमी और शिक्षा बजट में कटौती से चिंतित हैं।
- सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारी: वेतन वृद्धि न होने पर सेवाएँ बाधित करने की चेतावनी दे रहे हैं।
प्रदर्शनकारी सड़कों पर वाहन और बसें जला रहे हैं, जिससे माहौल और भी गंभीर हो गया है।
आर्थिक और सामाजिक प्रभाव खर्च में कटौती और मुद्रास्फीति का मिला-जुला असर लोगों पर भारी पड़ रहा है। परिवारों का कहना है कि उनकी वास्तविक आय कम हो रही है, जिससे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बने कल्याणकारी राज्य के मॉडल पर खतरा मंडरा रहा है, जिसमें पेंशन और छुट्टियाँ महत्वपूर्ण थीं। लोगों को डर है कि सरकार यूरोपीय संघ के नियमों को पूरा करने के लिए उनकी ज़रूरतों को नज़रअंदाज़ कर रही है।
सरकार की प्रतिक्रिया और ऐतिहासिक संदर्भ प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने 80,000 पुलिसकर्मियों को तैनात किया है और सैकड़ों लोगों (300-400) को गिरफ्तार किया गया है। लेकिन इस सख्ती से उल्टा असर हो रहा है, और लोग और अधिक आक्रामक हो रहे हैं।
फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों का लंबा इतिहास रहा है। 2006, 2010 और 2023 में पेंशन सुधारों, 2018-19 में “येलो वेस्ट” आंदोलन के दौरान ईंधन करों, और 1990 व 2000 के दशक में श्रम कानूनों को लेकर कई बार हड़तालें हुई हैं। वर्तमान प्रदर्शन “येलो वेस्ट” आंदोलन की याद दिलाते हैं, जिसमें कामकाजी वर्ग का गुस्सा और दोनों विचारधाराओं का गठजोड़ दिख रहा है।
आगे क्या होगा? अगर मैक्रोन अपनी कटौती नीतियों पर अड़े रहे, तो विरोध और तेज़ हो सकता है। परिवहन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में हड़तालें बढ़ सकती हैं। फ्रांस में राजनीतिक अस्थिरता बढ़ने की आशंका है, क्योंकि कोई भी पार्टी पूर्ण बहुमत में नहीं है और सरकार गठबंधन पर टिकी है। संसद में पहले ही अविश्वास प्रस्ताव आ चुका है, और सरकार गिरने का खतरा भी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, मैक्रोन की सुधारवादी छवि को नुकसान पहुँच सकता है, क्योंकि वे अपने देश को संभालने में जूझ रहे हैं।