पूर्वोत्तर भारत के मणिपुर में रहने वाले बनेई मेनाशे समुदाय के लोग खुद को बाइबिल में बताए गए प्राचीन मानाशेह कबीले के वंशज मानते हैं। वे कहते हैं कि 2,700 साल पहले खो गए 10 यहूदी कबीलों में से वे एक हैं। अब उनका सबसे बड़ा सपना है – इजराइल जाना। वे इसे अपनी “पवित्र भूमि” कहते हैं और इसे “घर वापसी” मानते हैं।
कौन हैं ये लोग?
बनेई मेनाशे मुख्य रूप से मणिपुर के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं। वे खुद को यहूदी मानते हैं और बाइबिल की कहानियों को अपना इतिहास बताते हैं। जेवुलुन हाओकिप जैसे हजारों युवा रोज इजराइल के बारे में सोचते हैं। उनके लिए इजराइल सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि पूर्वजों का वादा पूरा करने का ठिकाना है।
क्यों जाना चाहते हैं इजराइल?
धार्मिक वजह: वे मानते हैं कि इजराइल उनकी असली मिट्टी है। वहां जाना सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि अपनी पहचान वापस पाने का तरीका है।
आर्थिक मुश्किलें: मणिपुर के पहाड़ी गांवों में गरीबी बहुत ज्यादा है। जमीन पत्थरीली है, फसल अच्छी नहीं होती। जातीय लड़ाइयां चलती रहती हैं। नौकरियां या मजदूरी भी मुश्किल से मिलती है। वे उम्मीद करते हैं कि इजराइल के कारखानों और शहरों में उन्हें अच्छा काम मिल जाएगा।

इजराइल में क्या इंतजार कर रहा है?
इजराइल सरकार का प्लान है कि इन लोगों को लेबनान सीमा के पास गलिली इलाके में बसाया जाए। लेकिन वहां अक्सर हिज्बुल्ला के रॉकेट हमले होते रहते हैं। फिर भी ये लोग कहते हैं – “हम मौत से नहीं डरते। पवित्र भूमि पर लौटने के लिए हर खतरा मोल लेंगे।”
भारत और इजराइल में कैसा व्यवहार?
भारत में अब उनके यहूदी धर्म को लेकर सहनशीलता बढ़ गई है। पहले का भेदभाव कम हो गया है। लेकिन इजराइल पहुंचने वाले कई लोगों का कहना है कि वहां सब आसान नहीं। नातान किप्गेन जैसे लोग बताते हैं कि कुछ इजराइली उनकी प्रार्थना के तरीके पर शक करते हैं। सिनागॉग (यहूदी मंदिर) में भी कभी-कभी उन्हें नीचा दिखाया जाता है।
बनेई मेनाशे के लिए इजराइल जाना सिर्फ एक जगह बदलना नहीं है। यह उनकी “घर वापसी” है। यह गरीबी, लड़ाइयों और मुश्किलों से निकलकर एक नई जिंदगी शुरू करने का रास्ता है। हजारों लोग अभी भी इंतजार कर रहे हैं – कब आएगा वो दिन जब वे अपनी पवित्र भूमि पर कदम रखेंगे।
