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संसद के मानसून सत्र 2025, जो 21 जुलाई से 21 अगस्त तक चलेगा, के दौरान राज्यसभा में नए सभापति (चेयरमैन) की नियुक्ति की संभावना कम होने के कई कारण हैं। नीचे इसके प्रमुख कारणों का विवरण हिंदी में दिया गया है:
- उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा: उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ ने 21 जुलाई 2025 को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। यह अप्रत्याशित कदम था, जिसने नए सभापति की नियुक्ति के लिए समय और प्रक्रिया को जटिल बना दिया। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 64 के अनुसार, उपराष्ट्रपति ही राज्यसभा का सभापति होता है, और उनके इस्तीफे के बाद नए उपराष्ट्रपति का चुनाव आवश्यक है।
- नए उपराष्ट्रपति के चुनाव में समय: भारतीय संविधान के अनुच्छेद 68(2) के अनुसार, उपराष्ट्रपति के पद में रिक्ति होने पर “जितनी जल्दी हो सके” नया चुनाव कराना होता है। हालांकि, इस प्रक्रिया में समय लगता है, क्योंकि इसमें संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली (प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन) के तहत मतदान शामिल होता है। मानसून सत्र में केवल 21 कार्यकारी दिन (32 दिनों में, 12-18 अगस्त तक अवकाश सहित) हैं, जो इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए अपर्याप्त हो सकते हैं।
- उपसभापति द्वारा कार्यवाही संचालन: धनखड़ के इस्तीफे के बाद, राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश सिंह ने कार्यवाही की जिम्मेदारी संभाली है। संविधान के अनुच्छेद 91 के तहत, उपसभापति तब तक सभापति के कर्तव्यों का निर्वहन कर सकते हैं, जब तक नया उपराष्ट्रपति चुना नहीं जाता। यह व्यवस्था सत्र के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करती है, जिससे नए सभापति की तत्काल नियुक्ति की आवश्यकता कम हो जाती है।
- संसद सत्र की व्यस्तता और प्राथमिकताएं: मानसून सत्र में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हो रही है, जैसे पहलगाम आतंकी हमला, ऑपरेशन सिंदूर, बिहार में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), और डोनाल्ड ट्रंप के भारत-पाकिस्तान युद्धविराम मध्यस्थता के दावे। इसके अलावा, सरकार 17 विधेयकों को पेश करने की योजना बना रही है, जिनमें बिल ऑफ लैडिंग विधेयक 2025 और राष्ट्रीय खेल प्रशासन विधेयक जैसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव शामिल हैं। इन व्यस्तताओं के कारण नए उपराष्ट्रपति के चुनाव को प्राथमिकता देना मुश्किल हो सकता है।
- राजनीतिक जटिलताएं और अटकलें: धनखड़ के इस्तीफे ने राजनीतिक हलकों में अटकलों को जन्म दिया है, जिसमें कुछ लोग इसे भाजपा की आंतरिक गतिशीलता या विपक्ष के दबाव से जोड़ रहे हैं। विपक्ष ने पहले धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी, जिसे उनके पक्षपातपूर्ण आचरण से जोड़ा गया। इन राजनीतिक तनावों के बीच, सरकार और संसद नए सभापति के चुनाव को जल्दबाजी में आयोजित करने से बच सकते हैं ताकि सत्र में व्यवधान कम हो।
- कोई तय समयसीमा नहीं: हालांकि संविधान में नए उपराष्ट्रपति का चुनाव “जल्द से जल्द” करने की बात कही गई है, लेकिन इसके लिए कोई निश्चित समयसीमा नहीं है। इससे सरकार को सत्र समाप्त होने तक इस प्रक्रिया को टालने की छूट मिल सकती है, खासकर जब उपसभापति कार्यवाही को संभाल रहे हों।
निष्कर्ष: राज्यसभा में नए सभापति की नियुक्ति के लिए उपराष्ट्रपति का चुनाव आवश्यक है, लेकिन मानसून सत्र 2025 की छोटी अवधि, उपसभापति द्वारा कार्यवाही का संचालन, और अन्य महत्वपूर्ण विधायी व राजनीतिक प्राथमिकताओं के कारण इसकी संभावना कम है। उपसभापति हरिवंश सिंह सत्र के अंत तक कार्यवाही संभाल सकते हैं, और नया उपराष्ट्रपति (जो स्वतः सभापति होगा) संभवतः सत्र के बाद चुना जाएगा।